राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
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निकले, कोई तो हल निकले
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जीवन हुआ, जैसे कटी पतँग हुआ
कुछ रँग-बिरँगा हुआ, कुछ बेरँग हुआ
जीवन में जीवन का मंत्र हुआ, अनंत हुआ
जो होना था वह नहीं हुआ, जरा भी नहीं
और जो नहीं होना था वह हुआ, खूब हुआ
जब नहीं होना था तब हुआ, बहुत हुआ
और जब होना था तब जरा भी हुआ नहीं
ये क्या हुआ, ये क्यों हुआ, ये कैसे हुआ
बार-बार पूछना हुआ, बार-बार बंद हुआ
कभी बंद मकान हुआ, कभी बेईमान हुआ
कभी खिड़की, कभी बंद रोशनदान हुआ
कभी रूमाल, कभी धूलभरा गुलाल हुआ
कतरा-कतरा आँख से टपका आँसू हुआ
मगर कभी भी कतरा-ऐ-खूँ नहीं हुआ
थोड़ा अच्छा हुआ, थोड़ा-थोड़ा बुरा हुआ
जैसा भी हुआ, बेहतर हुआ, बदतर हुआ
वह जो था अपना-सा, अपना कब हुआ
हँसते-हँसाते हुए हुआ, ठीक नहीं हुआ
इसी जीवन हुआ, करवटें बदलते हुए हुआ
बिखरा-बिखरा सुख, ठहरा-ठहरा दु:ख
कभी नदी में नाव, कभी नाव में नदी हुआ
कुछ लिखा, कुछ अलिखा हुआ, यही हुआ
जैसा भी हो सकता था, वैसा ही हुआ
जीवन में जीवन जैसा जीवन पूरा हुआ
कुछ कहना, कुछ सुनना-सुनाना हुआ
घंटी बजती रही, नींद आती रही देर तक
कभी मैं सोता रहा, कभी मैं जागता रहा
ये सोचता रहा कि आग का हुआ क्या
कुछ नया-पुराना-सा सपना था वह जो
अंततः आया तो आया कहाँ,गया तो कहाँ
पुकार जो पुकारती रहती थी फिर-फिर
गई कहाँ, गई कहाँ, क्यों ढूँढ़ता रहता हूँ मैं
क्यों मटमैला है जलाशय सारा का सारा
आतंक ने ध्वस्त कर दी हैं उम्मीदें तमाम
बर्बरता ने हड़प ली हैं आकाँक्षाएँ सभी
क्रूरता बैठी है शिखर पर, बजाती है बाँसुरी
और गाहे-बगाहे मैं इकठ्ठा करता हूँ बारूद
निकले, कोई तो हल निकले।
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