रचनाकार अनुराग बघेल
बिजराकापा (खुर्द) मुंगेली
छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मैं ग्वाला, मैं ग्वाला,
गाय, भैंस और बकरी का चरवाहा।
पाँवों में छाले, पर मन में उजाला,
मैं रक्षक, मैं ही ग्वाला।
पसीने की स्याही से लिखता हूँ गाथा,
न झुकता है पर्वत, न झुकता है माथा।
जंगलों का सन्नाटा संगीत है मेरा,
तारों की चादर में होता बसेरा।
बेज़ुबानों की आँखों का विश्वास हूँ मैं,
सूखी हुई धरती की प्यास हूँ मैं।
भीड़ से अलग, एक है कहानी,
मेरी नस-नस में दौड़ता मिट्टी का पानी।
शून्य से शुरू, मैं अनंत का प्याला,
मैं हूँ रक्षक, मैं ही हूँ ग्वाला।
धूप की तपन मेरी देह को निखारे,
नदी की कल-कल मुझे पास पुकारे।
मैं थकता नहीं, मैं रुकता नहीं,
वक्त के आगे कभी झुकता नहीं।
आगे चलता मैं, बनते पैर के निशानी
पुरखों की शक्ति और नई जवानी।
ब्रह्मांड का अंश, यह जग का उजाला,
मिट्टी का रक्षक, मैं ही ग्वाला।






