राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
हम!
(कविता)
सब अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं,
हँसते-खेलते, सपनो में डूबे हैं रात दिन
हम काम करते करते, जबरन सोचते हुए,
साँस थम जाती है, आँखें बंद हो जाती हैं।
पता नहीं क्यों,,,मरे जाते हैं हम!
लगता कि वास्तविक जीवन कुछ और है
सुबह उठो, दौड़ो, काम करो, खूब थको।
शाम को चाय पियो, थकान फिर भी रहती,
रात को सोचते सोचते बस, सपने देखो।
पता नहीं क्यों,,,मरे जाते हैं हम!
स्वार्थी दुनियां में रिश्ते बनते हैं, टूटते हैं,
प्यार का छलावा मिलता, छूट जाता है।
जीने के लिए कमाओ, कुछ बचता नहीं,
दो रोज की खुशी ,खाली हाथ रह जाओ।
पता नहीं क्यों,,,मरे जाते हैं हम!
बच्चे बड़े हो गए, माता-पिता अब रहे नहीं,
दोस्त बिखर तिनके से , यादें फकत शेष हैं।
हर दिन, एक नया झूठ बोलता है आसमाँ,
हर मौसम,एक पुराना सच याद दिलाता है।
पता नहीं क्यों,,,मरे जाते हैं हम!
देखो,मौत दरवाजे पर खड़ी हँसती है।
न कोई पूछता, न कोई बताता है कुछ
हर दिन साँस फूलकर, रुक जाती है,
और सारी मस्ती धूल में मिट जाती है।
पता नहीं क्यों,,,मरे जाते हैं हम!







