कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी
‘चन्दू’
बस्ती, अयोध्या धाम
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
खिल उठा प्रात
खिल उठा प्रात, धरा मुस्काई,
नई उमंगें जीवन में आईं।
सूरज ने स्वर्णिम चादर डाली,
देख प्रकृति की छटा निराली।
पत्तों पर मोती चमक रहे हैं,
फूल खुशी से दमक रहे हैं।
कलियों ने घूँघट आज उठाया,
भँवरों ने मधुरिम गीत सुनाया।
चिड़ियों ने जब तान सुनाई,
सोई दुनिया नींद से जागी।
मंद पवन ने द्वार खटखटाया,
आशाओं का दीप जलाया।
रात गई, अब भोर हुई है,
नई दिशा की ओर हुई है।
बीते कल का शोक भुलाकर,
चलो सफलता के पथ पर जाकर।
काँटों में भी फूल खिलेंगे,
मेहनत से सब स्वप्न मिलेंगे।
मन में दृढ़ विश्वास जगाओ,
अपने भाग्य स्वयं लिख जाओ।
नहीं निराशा मन में पालो,
आशा के दीपक को बालो।
हर मुश्किल से लड़ना सीखो,
गिरकर फिर से उठना सीखो।
चन्द्रमती का कहना मानो,
जीवन का सच्चा सुख जानो।
हर दिन नई उमंग जगाओ,
खिल उठे प्रात, तुम मुस्कुराओ!
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खुशियों का सौगात, अनमोल उपहार,
लाई माता अपने साथ,
मेरा प्यार, मेरा प्यार, देने आईं सौगात।
लाल चुनरिया ओढ़ के मैया, आईं मेरे द्वार,
फूलों से महका आँगन मेरा, खिल उठा संसार,
मन में जगी है आस, पूरी होगी हर बात,
मेरा प्यार, मेरा प्यार, देने आईं सौगात।
माथे पर बिंदिया चमके, हाथों में कंगन लाल,
दर्शन पाकर मैया के, भक्त हुए निहाल,
झूमे सारा धाम, गूँजे जयकारों की बात,
मेरा प्यार, मेरा प्यार, देने आईं सौगात।
दुखियों के दुख हरने वाली, सबकी भाग्य विधाता,
भटके हुए हृदय को मैया, सच्ची राह दिखाता,
तेरे चरणों में मैया, बीते मेरी हर रात,
मेरा प्यार, मेरा प्यार, देने आईं सौगात।
खुशियों का सौगात, अनमोल उपहार,
लाई माता अपने साथ,
मेरा प्यार, मेरा प्यार, देने आईं सौगात।






