सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/ लेखिका/शिक्षिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा/राजिम
रायपुर, (छ.ग.)
(नया अध्याय, देहरादून)
आलेख:
मन का बोझ हल्का रखना ही असली कला है !
-सुश्री सरोज कंसारी
खुद पर दया करो। जो मन को आहत करे, उसे मिटा दो। छोड़ देना कमजोरी नहीं, जीने की सबसे बड़ी कला है।
————————————————————–
समाज सर्वांगीण विकास का आधार है,
रूढ़िवादी विचारों के पूर्ण त्याग का।
मिलकर गढ़ें समाज नए एहसास का,
मिटा दें हर लकीर आपसी भेदभाव का।
कई बार चुप रहना या पीछे हट जाना हार नहीं होती। शांत रहना कमजोरी नहीं, बल्कि एक सुपरपावर है। आपका अपने मन पर नियंत्रण है। यूँ तो रोटी, कपड़ा और मकान जीवन की बुनियादी जरूरतें हैं। पेट भरने को भोजन, तन ढकने को कपड़ा और रहने को घर न हो तो मनुष्य इन्हीं में सिमट कर रह जाता है। इन मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हर व्यक्ति का अधिकार और परिवार के प्रति उसका पहला कर्तव्य है। पर इसके बाद हमारी सोच सागर-सी विशाल होनी चाहिए। सागर नदियों, नालों, झरनों को निस्वार्थ अपनी बाहों में समेट लेता है। तब कोई नहीं पूछता कि कौन कहाँ से आया। सब एक होकर अविरल बहते हैं और संसार को आकर्षित करते हैं। समाज भी ऐसा ही होना चाहिए। हम जिस समाज में रहते हैं वहाँ अमीर-गरीब, अच्छे-बुरे, हर तरह के लोग हैं। कोई दयनीय स्थिति में है तो कोई महलों में। पर कहलाते सभी सामाजिक जन हैं। समाजविहीन मनुष्य का जीवन पशु-तुल्य होता है। समाज से ही हमें अधिकार, कर्तव्य, संस्कार, साहस और जीवनोपयोगी ज्ञान मिलता है। समाज सुख-दुख का सहभागी है, जिसकी अपनी मर्यादाएँ और नियम हैं। एक व्यवस्थित समाज में अलग विचार, रंग-रूप, वेशभूषा और दिनचर्या वाले लोग होते हैं, पर तीज-त्योहार सब मिलकर मनाते हैं। वहाँ ऊँच-नीच का भेद नहीं, बंधुत्व का भाव होता है। हर समाज के नियम अलग होते हैं। कुछ कठोर, कुछ लचीले। पर उद्देश्य एक ही है: सभी का सतत विकास। कुछ दिन पहले अखबार में पढ़ा कि अमुक समाज ने रूढ़िवादी परंपराओं को त्यागकर नई सोच अपनाने का निर्णय लिया है। अब वे हर व्यक्ति के स्तर को ध्यान में रखकर काम करेंगे। ऐसी परंपराएँ हटाई जाएँगी जो मानसिक और आर्थिक बोझ डालती हैं। जैसे: मृत्युभोज में दशगात्र और तेरहवीं को अनिवार्य न रखकर स्वैच्छिक करना, या उसके बदले गरीबों को भोजन कराना। दुखी परिवार को आर्थिक सहायता देना, कफन के बदले राशि देना, निर्धन मेधावी बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना, सामूहिक विवाह कराना, युवाओं की ऊर्जा को समाजहित में लगाना, बीमार और असहाय की मदद करना। यदि हर समाज में औरों की पीड़ा समझने की संवेदना और सच्चा भाईचारा हो, तो वह दूसरों के लिए प्रेरणा बनेगा। समय और परिस्थिति के अनुसार बदलाव जरूरी है। तभी समाज का चहुँमुखी विकास संभव है। सदियों से चली आ रही दकियानूसी रीतियों पर चिंतन आवश्यक है। देखें कि क्या वे आज भी समाजोपयोगी हैं। यदि नहीं, तो सामाजिक हित में उनमें बदलाव लाएँ। जरा-सी बात पर तिल का ताड़ बनाना, छोटी-छोटी बातों पर बहस, लड़ाई-झगड़े, बैर-भाव, द्वेष, मनमुटाव समाज में नहीं होने चाहिए। तभी हम कठिन दौर और विकट समस्याओं का मिलकर सामना कर सकेंगे।…मन का बोझ हल्का रखना ही असली कला है। जो बात दिल को चुभे, उसे पकड़कर बैठ जाएँ तो वही ज़ख्म बन जाती है। छोड़ देना, ध्यान हटा लेना — यही खुद पर दया है। हमारी संवेदनाएँ ही तो जीवन को रंग देती हैं — पर हर रंग को दिल में जगह दें, ये ज़रूरी नहीं। कुछ रंगों को बस देखकर आगे बढ़ जाना बेहतर होता है। संसार में सब जीना चाहते हैं, ये सच है। पर सबकी आँखों में दया हो, ये उम्मीद पालेंगे तो अपना ही मन दुखेगा। इसलिए अपना नज़रिया साफ रखो, अपना दिल नरम रखो, बाकी दुनिया को उसके हाल पर छोड़ दो।
चारों तरफ शोर, गाली-गलौज और बिना वजह टांग खींचने वाले लोग दिखें तो लगता है दुनिया सच में बेरहम हो गई है। दुनिया पूरी तरह नहीं बदली, शोर बढ़ गया है…पहले भी बुरे लोग थे, फर्क इतना है कि अब हर झगड़ा, हर गाली मोबाइल कैमरे में कैद होकर सबके सामने आ जाती है। अच्छाई चुपचाप होती है, इसलिए दिखती कम है। अस्पताल में डॉक्टर, बस में सीट देने वाला लड़का, बेजुबान को खाना खिलाने वाली आंटी — ये खबर नहीं बनते। सज्जन होना कमजोरी नहीं है…लफंगे शोर मचाते हैं क्योंकि उनके पास दिखाने को वही है। सज्जन लोग परेशान किए जाते हैं क्योंकि उन्हें उकसाना आसान लगता है। पर याद रखो: कीचड़ में पत्थर मारोगे तो छींटे खुद पर ही पड़ेंगे। खुद को दूर रखना सेल्फ-डिफेंस है, कायरता नहीं! हर लड़ाई लड़ने लायक नहीं होती। जहाँ गालियों से बात शुरू हो, वहाँ इज्जत बचाकर निकल जाना ही जीत है। एनर्जी बचाओ उन लोगों के लिए जो तुम्हारी कद्र करते हैं….अत्याचारी सबसे ज्यादा शोर करते हैं जो अंदर से खाली होते हैं वो ही सबसे ज्यादा फनफनाते हैं। उनका मकसद तुम्हें भी अपने लेवल पर घसीटना है। रिएक्ट नहीं करोगे तो उनका खेल खत्म।
गंभीरता से देखें तो समाज के पिछड़े वर्ग के लिए सद्भावना एक जरूरत है। उन्हें रोटी-कपड़ा-मकान के साथ सामाजिक सहयोग, दया, करुणा, अपनापन, सहानुभूति, प्रेरणा, उचित मार्गदर्शन और साथ की बेहद आवश्यकता होती है। समाज कोरी कल्पना न बने। बाहरी आडंबर से दूर, उसमें वास्तविक पारिवारिक भाव हो, जहाँ पिछड़े वर्ग के लोग निर्भीक होकर अपनी बात कह सकें। मजबूरी वश जो लोग शारीरिक, मानसिक, आर्थिक या शैक्षिक रूप से पिछड़ गए, उन्हें साथ लेकर चलना और ऊपर उठाना सबसे जरूरी काम है। अपने सामाजिक बंधुओं को दर्द और गम से निकालकर खुशनुमा माहौल देना सबसे बड़ा सामाजिक दायित्व है। उनकी रूठी हुई सोच को समझना जरूरी है। प्रत्येक मनुष्य समाज का सहभागी बने, इसके लिए उदास और नाराज लोगों को मुख्यधारा से जोड़ना होगा। वे समाज का विरोध क्यों करते हैं, इसका सही कारण जानकर निदान करना होगा। तभी हम एक श्रेष्ठ समाज के जिम्मेदार नागरिक तैयार कर पाएँगे। समाज हमारी एक जिम्मेदारी है, जीवन की यह एक सुंदर धुरी है।
मन के आँगन में जो काँटे बो दे,
उन पर रोज पानी देना छोड़ दो।
हर बात को सीने से लगाओगे,
तो जख्म ही जख्म में जिंदगी मोड़ दो।
संवेदना से रंगा है जीवन सारा,
पर हर रंग को दिल में भरना जरूरी नहीं।
कुछ रंग धुंधले अच्छे लगते हैं,
हर तस्वीर का पूरा उतरना जरूरी नहीं।
दुनिया जीना चाहती है, ये सच है,
पर सबकी आँख में दया ढूँढोगे तो थक जाओगे।
अपना नजरिया शीशे सा रखो साफ,
अपना दिल दरिया सा रखो नरम,
बाकी को बस बह जाने दो।
जो चुभे उसे यादों से मिटा दो,
ध्यान देना ही छोड़ दो तो बात बन जाए।
खुद पर दया करना सीख लो,
यही जीने की असली राह बन जाए।
हर बात को दिल से लगाना जरूरी नहीं..! जो चुभे, जो तोड़े, उसे रोज याद करके खुद को तकलीफ देने से बेहतर है ध्यान हटा लेना। काँटों को पानी दोगे तो वो और उगेंगे..!संवेदनशील होना अच्छी बात है, पर सीमा भी ज़रूरी है…जिंदगी रंगों से खूबसूरत है। पर हर रंग को अपने अंदर भर लोगे तो मन बोझिल हो जाएगा। कुछ बातें धुंधली करके आगे बढ़ जाना ही समझदारी है। सब जीना चाहते हैं, पर सबके पास हमदर्दी नहीं होती। अपना नजरिया साफ रखो, हमेशा दिल नरम रखो।
—————————————————————






