कविता-अति पिछड़ा

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राजेन्द्र सिंह जादौन (उज्जट पत्रकार)

भोपाल

 

        (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

कविता-अति पिछड़ा

 

 

साहब मैं पत्रकार हूँ,

कभी “गरीब” कहलाता हूँ,

कभी “अति पिछड़ा” में गिना जाता हूँ,

फाइलों में मेरी पहचान बदलती रहती है,

पर जमीनी हकीकत में

मैं बस एक “जरूरत” भर रह जाता हूँ।

 

मेरी जाति पूछते हैं आप?

तो लिख लीजिए

मैं उस जाति का हूँ

जिसे हर सरकार अपने हिसाब से गढ़ती है,

जब जरूरत पड़े तो “चौथा स्तंभ” कहती है,

और जब सच चुभ जाए

तो “ब्लैकमेलर” बना देती है।

 

थोड़ा सच लिख दूँ तो

विज्ञापन की कतार में

मुझे खड़ा कर दिया जाता है,

“सर, पहले ये खबर रोकिए…

फिर देखिए कैसे आपका सम्मान बढ़ता है”

ये वाक्य अब मेरे लिए

किसी सरकारी योजना से कम नहीं।

 

और अगर जिद कर लूँ

तो फाइलों में नोटिंग शुरू हो जाती है

“इसको थोड़ा संभालो…”

“इसकी पहुंच कहाँ तक है…”

“किसके इशारे पर लिख रहा है…”

 

साहब,

मैं श्रमजीवी कहलाता हूँ,

पर मेरे हिस्से का हक

कभी बजट में नहीं आता,

मेरी तनख्वाह से ज्यादा

मेरी चुप्पी की कीमत लगाई जाती है।

 

दिन भर सच ढोता हूँ,

रात में समझौते का बोझ उठाता हूँ,

और सुबह फिर वही सवाल

“आज क्या लिखना है

सच या सुरक्षित झूठ?”

 

मेरी कलम बिकती नहीं,

इसलिए अक्सर भूखी रह जाती है,

और जो बिक जाती हैं

वो बड़े-बड़े दफ्तरों में

एसी की हवा खाती हैं।

 

साहब,

यहाँ पत्रकारिता अब पेशा नहीं,

एक “एडजस्टमेंट” बन चुकी है,

जहाँ खबर से पहले

विज्ञापन की हेडलाइन तय होती है,

और सच को छापने से पहले

उसकी “कीमत” पूछी जाती है।

 

मैं उस जाति से हूँ

जिसका कोई आरक्षण नहीं,

पर हर दबाव में आरक्षित हूँ,

मैं उस वर्ग से हूँ

जिसे हर मंच पर सम्मान मिलता है,

और हर सिस्टम में अपमान।

 

कभी सत्ता मुझे अपने साथ बैठाती है,

तो कभी वही सत्ता

मुझे दरवाजे के बाहर खड़ा कर देती है,

कभी कहती है

“आप लोकतंत्र के प्रहरी हैं”

और अगले ही पल

मेरे सवालों को “एजेंडा” बता देती है।

 

साहब,

मेरे हिस्से का हक

ना किसी आयोग में दर्ज है,

ना किसी कानून में लिखा है,

वो बस मेरी हिम्मत में छिपा है

जितना बचा लूँ, उतना मेरा।

 

मैं पत्रकार हूँ

मेरी जाति “संघर्ष” है,

मेरा धर्म “सवाल” है,

और मेरा कर्म

हर उस सच को जिंदा रखना है

जिसे मारने की पूरी कोशिश की जाती है।

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