साँसों का साथ : देह मिट्टी में मिल जाएगी, पर अच्छाई की खुशबू युगों तक महकेगी

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री/ लेखिका/शिक्षिका

अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति

 गोबरा नवापारा/राजिम

रायपुर, (छ.ग.)

 

                   (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

                               लेख –

साँसों का साथ : देह मिट्टी में मिल जाएगी, पर अच्छाई की खुशबू युगों तक महकेगी

                         -सुश्री सरोज कंसारी 

 

हम यहाँ मुट्ठी बांध के आते हैं, खुली मुट्ठी लिए चले जाते हैं। बीच में जो “मेरा-तेरा” का हिसाब चलता है ना, वो सब यहीं धरा रह जाता है।

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जीवन क्षणभंगुर है। साँसें कभी भी थम सकती हैं। ये शरीर और ये जीवन हमेशा के लिए नहीं मिला। ये तो सत्य है…शरीर नाशवान है। मिट्टी से बना है और मिट्टी में ही मिल जाना है। धन, रूप, ताकत, सब यहीं छूट जाएगा।

 

जो नेकी, प्रेम, मदद, और सच्चाई लोगों के साथ बाँटा जाता है, वो कभी नहीं मरती। शरीर चला जाता है, पर अच्छे कर्मों की सुगंध लोगों के दिलों में पीढ़ियों तक बसी रहती है…इंसान शरीर से नहीं, अपने कर्म से अमर होता है। इसलिए साँसें चल रही हैं तब तक इकट्ठा करने में नहीं, बाँटने में ज़िंदगी लगा। क्योंकि याद पैसे को नहीं, एहसास को की जाती है।

 

साथ जाती है बस वही बात जो तूने लोगों के दिल में बो दी — कोई हँसी, कोई मदद, कोई नेक काम। सिकंदर भी खाली हाथ गया था, पर कर्मों की कहानी आज तक ज़िंदा है…इसलिए पाने-खोने के चक्कर से ऊपर उठ जा।धरातल पर निशान पैसे से नहीं, असर से बनते हैं।

 

साँसों का चमत्कार और ज़िन्दगी का अर्थ…साँसों का चलना चमत्कार है। जब तक साँसें हैं, इंसान जीवन जी सकता है। इस जीवन में ज़िन्दगी रहना ज़रूरी है – तनावमुक्त रहकर। ये जीवन में निरन्तर खुद की अंतरआत्मा को सुनो, समझो।

 

साँस का चलना ही इस संसार का सबसे बड़ा चमत्कार है। हम रोज हजारों बार साँस लेते और छोड़ते हैं, पर कभी ठहर कर सोचते नहीं कि यही एक डोर है जो हमें जीवन से बाँधे रखती है। जिस पल ये डोर टूटी, सब कुछ थम जाएगा। इसलिए जब तक साँस है, तब तक संभावना है।

 

पर यहाँ एक बात समझना बहुत ज़रूरी है: साँसों का चलना जीवन है, पर केवल साँस लेना जिन्दगी नहीं है। जीवन तो शरीर का नाम है, ज़िन्दगी आत्मा का अनुभव है। बहुत लोग साँसें गिनते-गिनते पूरी उम्र काट देते हैं, पर जी नहीं पाते। उनकी साँसें चलती रहती हैं, दिल धड़कता रहता है, मगर भीतर सब सूना होता है।

 

जिन्दगी तब शुरू होती है जब हम तनाव से मुक्त होते हैं। तनाव मन का शोर है। और जब तक मन में शोर है, तब तक हम अपनी अंतरआत्मा की धीमी आवाज़ सुन ही नहीं सकते। अंतरआत्मा कभी चिल्लाती नहीं, वो फुसफुसाती है। उसे सुनने के लिए रुकना पड़ता है, शांत होना पड़ता है।

 

भागदौड़ भरी इस दुनिया में हम सबसे ज्यादा खुद से ही दूर हो गए हैं। हमारे पास सबके लिए समय है, सिवाय अपने लिए। हम फोन की बैटरी चार्ज करते हैं, पर अपनी आत्मा को चार्ज करना भूल जाते हैं।

 

धरातल के इंसान इस जीवन को समझ और जान ही नहीं पाते। अपनी मरोड़ में रहते हैं, तेरा-मेरा में लगे रहते हैं। मालिक बनते हैं, खुद को समझते हैं मैं तो करोड़पति हूँ। पर इंसान को समझना चाहिए कि आने वाली शाम आएगी भी या नहीं। सबके हित के लिए मंगल कामना करनी चाहिए। कभी किसी का दिल दुखे हमसे, इससे बड़ा कोई पाप नहीं।

 

अंतरआत्मा ही हमारा असली है। जब भी जीवन में उलझन हो, आँख बंद करके एक गहरी साँस लो और भीतर पूछो – जवाब वहीं से आएगा।

 

इसलिए याद रखिए: साँसों को मत गिनिए, साँसों के साथ जीना सीखिए। हर साँस एक नया मौका है – माफ़ करने का, शुक्रिया कहने का, मुस्कुराने का, खुद को बेहतर बनाने का। जीवन तो सबको मिलता है, पर उसे ज़िन्दगी में बदलना हमारी ज़िम्मेदारी है।

 

अंत में बस इतना ही: उम्र बढ़ाना प्रकृति का काम है, अनुभव बढ़ाना हमारा काम है। और अनुभव तभी बढ़ेंगे जब हम तनाव छोड़कर, अपनी अंतरआत्मा को सुनकर, हर पल को पूरे होश से जिएँगे।

देह मिटेगी, नाम मिटेगा,

मिट्टी सब हो जाएगी,

पर नेकी की इक स्मृति तेरी,

दिल में घर कर जाएगी।

 

ये बड़ी अनमोल जिंदगी है…उधार की है। साँसें गिनती की हैं…शरीर मिट्टी है, मिट्टी में मिलना तय है। वो दिलों में खुशबू बनकर रह जाती है..इसलिए कमाने से बड़ा है बाँटना। नाम से बड़ा है काम। और जीने से बड़ा है किसी के काम आना है।

 

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