“नफरत के काँटे मत बोइए, सद्भाव के फूल खिलाइए”

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका

अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति

गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर, (छ.ग.)

 

 

                  (नया अध्याय, देहरादून)

 

                             आलेख:

 

   “नफरत के काँटे मत बोइए, सद्भाव के फूल खिलाइए”

                       -सुश्री सरोज कंसारी

 

       काँटे छोड़ो जिंदगी के, फूल सद्भाव के बो लो!”

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दुर्व्यवहार किसी को पसंद नहीं, हर आत्मा प्रेम की भूखी है…जीवन की सारी परेशानियाँ तब खत्म हो सकती हैं जब- हर इंसान दिल से कहे, दिल से सुने और दिल से ही करे। मानसिक परेशानी का एक बड़ा कारण यह भी है कि अनवरत संघर्ष में लगा हुआ मनुष्य का मन विभिन्न समस्याओं से बोझिल हो जाता है। उसे सिर्फ शारीरिक ही नहीं, मानसिक विश्राम की भी जरूरत होती है। और जब यह विश्राम नहीं मिलता तो चिड़चिड़ाहट, घबराहट और छोटी-छोटी बातों पर क्रोध आने लगता है। कारण साफ है: उस समय दिमाग पहले से ही बोझ से दबा होता है।

 

अपने कार्यक्षेत्र में व्यस्त रहने के कारण हमें कई प्रकार के लोगों से मिलना पड़ता है। सभी से अच्छे अनुभव नहीं मिलते। अधिकतर किसी न किसी बात से मन व्यथित हो ही जाता है। जब हर दिन एक ही जीवनशैली रहे और मानसिकता संतुलित न हो, तो जीवन अरुचिकर लगने लगता है। ऐसे में हर इंसान को शांति, सद्व्यवहार, स्नेह और प्रेम की सख्त जरूरत होती है। हर मनुष्य को सुखद वातावरण मिलना जरूरी है। जहाँ कलह, विवाद, ताने और परायेपन का आभास हो, वहाँ घुटन होती है। वहाँ एक पल बिताना भी मुश्किल हो जाता है। घर-परिवार तो सपनों का संसार होता है, जहाँ हर कोई खुद को सुरक्षित महसूस करता है। वहीं रहकर हम दुनिया को जानते हैं, सीखते हैं, अनुकरण करते हैं और वहीं से भविष्य निर्माण के लिए संस्कार, मर्यादा और संयम ग्रहण करते हैं। लेकिन जरा सोचिए, यदि परिवार का माहौल ही दूषित हो तो भटकाव निश्चित है।

 

गृह-कलह आज हर मनुष्य के जीवन में तनाव का प्रमुख केंद्र बन गया है। घर से निकलते समय अगर किसी बात को लेकर मन खराब है, किसी से अनबन या झगड़ा हो गया है, तो बाहर जिस ज़िम्मेदारी को निभाने जा रहे हैं उसे ठीक से कैसे निभा पाएंगे? क्योंकि हमारा ध्यान एकाग्र नहीं है। भीतर एक हलचल है, एक आंतरिक युद्ध चल रहा है। इसलिए परिवार में शांति होना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

 

दिनभर काम से थका मनुष्य घर आकर शांत वातावरण, मीठे बोल और अपनों की आँखों में प्रेम देखना चाहता है। लेकिन आज जीवन-निर्वाह करते हुए कई मानसिक यातनाएँ मिलती हैं। हम एक-दूसरे को समझने, सांत्वना देने और मनोबल बढ़ाने में असमर्थ होते जा रहे हैं। कहते हैं कि तन से ज्यादा मन की व्यथा अधिक व्याकुल करती है। जब अपनों से उम्मीद टूट जाती है, जब वे रूठ जाते हैं या दुर्व्यवहार करते हैं, तब अंतर्मन दुखी हो जाता है।

 

सच में सुकून का संबंध अमीरी से नहीं होता। गरीबी के साए में पलते हुए भी यदि आपस में सच्चा प्रेम है, तो जीवन सुंदर है। दिनभर रोजी-रोटी की तलाश में निकले परिवारजन जब घर लौटते हैं तो यदि उनका इंतजार होता है, आने पर एक-दूसरे का दुख-सुख पूछा जाता है, साथ बैठकर भोजन होता है, सभी को एक-दूसरे की परवाह होती है, किसी समस्या पर मिलकर समाधान ढूँढा जाता है, कभी चीखा-चिल्लाया नहीं जाता, सम्मान दिया जाता है, शिकायत नहीं होती, झगड़े नहीं होते, गलती को स्वीकार किया जाता है, तो उस घर में जाते ही सारी थकान मिट जाती है। अपनों का प्यार पाकर भले ही दौलत न हो, लेकिन वह घर मंदिर होता है। जहाँ अनावश्यक शोर नहीं होता, सिर्फ जरूरत के लिए नहीं बल्कि एक-दूसरे को जरूरी समझा जाता है। जहाँ सच्चे भाव होते हैं।

 

जब हम दिल से किसी से बात करते हैं, तब हम उसके अंतर्मन को स्पर्श करते हैं। हम एक-दूसरे से मन से जुड़ते हैं। जब हम किसी तकलीफ से गुजर रहे मनुष्य से आत्मीयता से बात करते हैं, तब वह ध्यान से सुनता है और हमारी हर बात को समझने की कोशिश करता है। उसमें विश्वास बढ़ता है। जब बिना किसी स्वार्थ के हम किसी दुखी हृदय से कहते हैं कि हम उसके साथ हैं, उसकी समस्या में सहयोग करेंगे, तब एक-दूसरे से लगाव होता है। यह लगाव सिर्फ दिखाने के लिए नहीं, निभाने के लिए होता है।

 

दिखावटी व्यवहार को सामने वाला कितना भी सजाकर कहे, समझ ही जाता है। आज भी हम भावनात्मक रूप से ही एक-दूसरे से जुड़ते हैं। इसलिए किसी के साथ रहें तो छल न करें। एक बार दिल में बस गए तो आपकी एक सुंदर छवि बनती है, लेकिन षड्यंत्र किया तो फिर हमेशा के लिए उनकी नजरों से उतर जाते हैं। लेन-देन बाजार-दुकान में करें। याद रखिए, रिश्तों में व्यापार करना हमेशा घाटे का सौदा होता है। रहना है तो किसी की यादों में, आँखों में और भावनाओं में रहिए। अपने अच्छे व्यक्तित्व से हर किसी को प्रेरणा दीजिए।

 

कोई भी कितने ही अपराधिक कार्यों में लिप्त रहे, लेकिन अंत में प्रेम की जीत हमेशा होती है। इसलिए कभी किसी की भावनाओं से खिलवाड़ मत कीजिए। चाहे छोटे हों या बड़े, उनसे ऐसे मिलिए कि मुलाकात यादगार बन जाए। इंसान के जीवन का हर एक लम्हा कीमती है। एक दिन हम सब बिछड़ जाएंगे, लेकिन पीछे छोड़ जाएंगे कुछ ऐसी कहानियाँ जिन्हें पढ़कर आने वाली पीढ़ी को एक नया मार्ग मिलेगा। आज रिश्तों को मजबूत बनाने की ज़रूरत है। घर तोड़ने वालों की नहीं, जोड़ने वालों की जरूरत है। जिनमें क्षमता हो, आपस में प्रेमपूर्ण व्यवहार हो। दौलत से ज्यादा रिश्तों को बटोरकर रखिए। उन्हें अलग होने की वजह मत दीजिए। ऐसा माहौल बनाइए कि कोई चाहकर भी दूर न जा सके।

 

दिल से किया गया हर प्रयास सफल होता है, क्योंकि उसमें मानवीय भाव होते हैं, सकारात्मक सोच होती है। दिल और दिमाग, ये दो ऐसी चीजें हैं जिनसे सारी गतिविधियाँ संचालित होती हैं। जब दिल से कोई काम करते हैं तो उसमें दिमाग का अहंकार नहीं होता, क्योंकि दिल नाजुक होता है। कुछ भी करने से पहले वह एक बार सोचता है कि इसका प्रभाव क्या पड़ेगा। दिल जरा सी कड़वाहट पाकर चोटिल हो जाता है। वहीं जल्दबाजी और क्रोध में किया गया काम कभी सफल नहीं होता।

 

दुर्व्यवहार किसी को पसंद नहीं। हर आत्मा प्रेम की भूखी है। नफरत पाकर जिंदगी गुमसुम हो जाती है, लेकिन प्रेम मनुष्य के लिए जरूरी है। कोई कैसा भी हो, उसे तकलीफ देने का अधिकार किसी को नहीं। महसूस करके देखिए, जब हमें किसी से दुर्व्यवहार मिलता है तो मन कितना दुखता है। जैसे अपने लिए हम सोचते हैं, वैसे ही दूसरों के प्रति सोच रखें तो कितना अच्छा होगा। बाहर की दुनिया में जाने से पहले एक नजर उन लोगों की तरफ भी दौड़ाइए जो सुबह से रात तक हमारे साथ तो रहते हैं, लेकिन हम कभी उन्हें महसूस नहीं कर पाते। क्या सोच रहे हैं, यह नहीं जान पाते। खून के रिश्तों के प्रति भी हम इतने लापरवाह हो गए हैं कि एक-दूसरे की तकलीफों से अनजान हैं। जो निभा रहे हैं, अक्सर उन्हें ही चोट मिल रही है। जिनके लिए हम सोचते हैं, वे अपनी दुनिया में मस्त हैं। जिंदगी जीने के लिए वैसे तो इंसान हर तरह के सुख की कल्पना करता है, लेकिन सबसे जरूरी क्या है, इस बात से अनजान होकर भोग-विलास और भौतिकता के पीछे दौड़ता है। नफरत की एक बूंद भी जिंदगी को नर्क बना देती है। लेकिन आपसी लड़ाई और मनमुटाव के कारण आज हर मन दुखी है। अंदर से सभी तन्हा हैं, अकेले हैं और घुटन भरी जिंदगी जीते हुए रोते हैं, क्योंकि आपस में प्रेम का भाव नहीं है। जबकि प्रेम की एक बूंद ही पर्याप्त है।…जिंदगी में उत्साह घोलने के लिए।

 

जब हम किसी से शुद्ध, सात्विक और स्नेहवश बात करते हैं, तो वह उस बात में रुचि लेता है, हर बात को सुनकर याद रखता है, भूलता नहीं। आज के समय में सभी पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण कर रहे हैं और अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। अच्छी बातों को समझने-सुनने को तैयार नहीं, सही-गलत सोचने का वक्त नहीं, बस दिखावे को पसंद करते हैं। वहीं जब कोई हमें सुनने को उत्सुक है, तो इसका एक ही कारण है कि वह आपके व्यक्तित्व, शालीनता और सादगी से प्रभावित है। इसलिए कभी बनावटी बात न करें। दिल से जब आवाज निकलती है, उसमें एक अलग आकर्षण होता है। कई बार हम कुछ सोचते हैं, लेकिन किसी कारणवश वह हो नहीं पाता। सपने भी टूट जाते हैं। जिस कार्य में मन नहीं, उसे भी करना पड़ता है। जिंदगी एक समझौता ही तो है। लेकिन उस समय पूरी मेहनत, लगन और एकाग्रता से उस कार्य को नहीं कर पाते और असफल हो जाते हैं। चाहे काम कोई भी हो, दिल से करें। जो मिला है उसे फर्ज समझकर बेहतर करें। निराश होकर किया गया कोई भी काम सही नहीं हो पाता। इसलिए दिल छोटा मत कीजिए। अपनी जिंदगी में मिली हर चीज का स्वागत कीजिए। खुद में ज्ञान और कौशल के गुण विकसित कीजिए और उसका सदुपयोग अच्छे कार्यों में कीजिए। व्यस्त रहिए, बेवजह की बातों में ज्यादा दिमाग मत लगाइए। बस दिल से काम लीजिए, स्वस्थ और आनंदित रहें।

 

हमें इस घृणा से भरे हुए संसार में निरंतर घृणा, द्वेष और वैर-भाव का परित्याग करने का प्रयास करना चाहिए तथा सद्भावना, संवेदना, मेल-जोल एवं परस्पर समझदारी जैसे सकारात्मक भावों का प्रसार करना चाहिए।

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