प्रभारी सम्पादक भोपालः राजेन्द्र सिंह जादौन
(नया अध्याय)
जादू, झालमुड़ी और जनादेश का स्वाद?
बंगाल के चुनाव परिणाम आते ही ऐसा लगा जैसे पूरे देश में एक साथ कई जादूगरों ने अपनी-अपनी टोपी से अलग-अलग खरगोश निकाल दिए हों। कोई कह रहा था “देखो, ये तो हमारी रणनीति का कमाल है”, तो कोई बोला “ये जनता का आशीर्वाद है।” पर सच तो यह है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा जादूगर हमेशा जनता ही होती है, बाकी सब तो बस मंच के कलाकार हैं, जो अपने-अपने संवाद याद करके आते हैं।
बंगाल की गलियों में इस बार भी राजनीति उतनी ही मसालेदार रही, जितनी एक ठेले पर बिकती झालमुड़ी। हर पार्टी ने अपने-अपने मसाले डाले कहीं विकास का स्वाद, कहीं पहचान की खुशबू, तो कहीं डर और उम्मीद का तीखापन। लेकिन जब परिणाम की थाली सामने आई, तो पता चला कि जनता ने किस मसाले को सच में पसंद किया और किसे सिर्फ सूंघकर ही छोड़ दिया।
चुनाव से पहले हर नेता अपने आप को जादूगर समझ रहा था। कोई दावा कर रहा था कि उसकी सभा में भीड़ देखकर विरोधी की हवा निकल गई है, तो कोई सोशल मीडिया के आंकड़ों को ही जनादेश मान बैठा था। लेकिन जैसे ही परिणाम आए, कई जादूगरों की “हाथ की सफाई” खुल गई। जो कल तक दूसरों के जादू को “काला जादू” बता रहे थे, आज वही अपने ही करतब के राज ढूंढते नजर आए।







