प्रभारी सम्पादकः पंकज सीबी मिश्रा, जौनपुर, यूपी।
महाकुंभ अपडेट: अध्यात्म और आस्था को मनोरंजन बनाने की तैयारी.!
संगम नगरी प्रायगराज में इस समय साधु ,संतो, श्रद्धालुओं के साथ – साथ मीडिया के नाम पर कुछ रील बनाने वाले नशेड़ी और कुछ धन लोलूप इनफ्लूएंसर भी कुंभ में गंध मचाते देखे जा रहे। महाकुंभ की महिमा और गरिमा तार तार करते हुए दिख रहे ये तमाम रील और सनातन न्यूज के नाम पर मजाक बनाने वाले लोगो को तत्काल प्रतिबंधित किए जाने की मांग करता हूं क्योंकि वे कुंभ की महिमा गरिमा महात्म्य और महत्व न स्वयं जानते हैं न उसके प्रचार प्रसार में भागी हैं उल्टे सस्ती लोकप्रियता के लिए महात्म्य को तार – तार करने पर आमादा है। उन्हें ये भी पता नहीं चल पाता कि कुंभ छोड़ कर जो ऊटपटांग दृश्य और चीजों से वे जो नरेटिव सेट कर रहे हैं उससे लम्बे समय तक धर्म संस्कृति, राष्ट्र और सनातन की कितनी भीषण क्षति होगी। ये स्थिति चिंता जनक ही नहीं हिंदुत्व के लिए भी घातक है और चिंतन-मनन का विषय है। ऐसे में ये सोशल मीडिया के साधन कुम्भ के प्रति हमारे मन में कोई आध्यात्मिक बात नहीं बैठा पाते जिससे हमें लगे कि इसके पीछे धर्म और विज्ञान का ऎसा संगम है जो अन्य किसी मत -मजहब में संभव ही नहीं है। आज जिसके हाथ में स्मार्ट फोन है वही पत्रकार बना घूम रहा है। प्रयागराज के महाकुम्भ की कवरेज देखकर आश्चर्य होती है। आईआईटी किये बाबा हो अथवा सबसे सुंदर साध्वी या फिर माला बेचने वाली सुंदर लड़की या एक हाथ उपर किये बाबा जी, काँटों में सोने वाले बाबा जी या फिर अग्नि कांड, कुम्भ का असल महात्मय इन्हीं खबरों में कही खो सा गया है। सादगी और सोशल मीडिया का असर देखिए सड़क पर बैठकर माला बेचने वाली इंदौर की लड़की ने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी मोहक मुस्कान पूरी दुनिया में वायरल हो जाएगी। आईं थी कुंभ मेले में कुछ कमाने धमाने। बाजार का असर रंग लाया। इसकी मुस्कान की तुलना मोनालिसा की मुस्कान से होने लगी। कहते हैं उसके मां बाप ने उसे वापस बुला लिया है। यूँ , संतों के संसार में महिलाएं पहली बार आईं हों ऐसा नहीं है। दशनाम संन्यासियों के सबसे बड़े जूना अखाड़े में पहले से ही माइवाडा विद्यमान है। यहां महिला संन्यासी बिरजाहोम संस्कार द्वारा दीक्षित होती आईं हैं। थर्ड जेंडर के लिए किन्नर अखाड़ा भी चला आ रहा है । संन्यासी अखाड़ों के साथ साथ बैरागी आणि अखाड़ों में भी हजारों की संख्या में स्त्री संत साध्वी भरी हुई हैं। यूट्यूबर हों अथवा टी0वी0/प्रिंट मीडिया सबके पास यही खबरें हैं। अरे भाई महाकुंभ है कही कल्पवास हो रहे होंगे, सत्संग हो रहे होंगे, भजन -कीर्तन हो रहे होंगे विचार विमर्श हो रहे होंगे कहीं आर्थिक सामाजिक विषयों पर मंथन चल रहा होगा उनकी खबर ही नहीं है। सबके जुबान पर वही बातें हैं। आई आई टी वाले बाबा माला बेचने वाली लड़की सुंदर साध्वी या फिर विदेश से आये लोगों की कहानियां और उनके पीछे भागते हमारे यूट्यूबर ब्लॉगर्स और मीडिया। अर्द्धकुम्भ, कुम्भ, महाकुम्भ क्यों और कब -कब आते हैं इनके आने की खगोलीय घटनायें क्या होती है? प्रयागराज में ही हर 144 वर्ष बाद महाकुम्भ क्यों लगता है? इसका क्या इतिहास है? कुम्भ के क्या ऐतिहासिक तथ्य है इन्हें जाने समझने और दिखाने को आज मीडिया तैयारी नहीं है।एप्पल को फाउंडर स्टीव जॉब्स की पत्नी लॉरेन जॉब्स संत वेश धारण कर प्रयागराज कुंभ पहुंची , कल्पवास कर रही हैं। बहुचर्चित यू ट्यूबर हर्षा रिछारिया भी साध्वी वेश धारण कर कुंभ में आई, पहला अमृत स्नान किया। दोनों ही निरंजनी अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर कैलाशानंद ब्रह्मचारी की शिष्याएं हैं। इन दिनों दोनों ही बहुचर्चित हैं, लेकिन दोनों के बीच कोई तुलना नहीं। नया जमाना आने के बावजूद पुरुष प्रधान भारतीय समाज में महिला संत साध्वियों को लेकर इस तरह की चर्चा होना आम बात है। संत बनीं स्त्रियां यदि विदेश या ग्लैमर वर्ल्ड से आई हों तो भारतीय समाज उन्हें हैरत की नजर से देखता है। खासकर तब तो और भी जब वे सुंदर हों। मतलब कुंभ महापर्वों में महिला संत कोई अजूबा विषय कभी नहीं रहीं। लॉरेन जॉब्स को सम्मानित दृष्टि से देखा जा रहा है। निःसंदेह वे भारतीय संस्कृति के प्रति अपार श्रद्धा, निष्ठा और जिज्ञासा लेकर आईं हैं। चर्चित हुईं हैं उत्तराखंड की मॉडल एवं यू ट्यूबर हर्षा रिछारिया। वे इंस्टाग्राम पर भी हैं सो उनकी अनेक रील और वीडियो वायरल किए जा रहे हैं। कुंभ नगर के आनंद स्वामी ने उन्हें कुंभ क्षेत्र से निकालने का सवाल उठाया तो संत जगत उनके साथ आ गया। यहां तक कि अवधेशानंद गिरी और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रविन्द्र पुरी भी उनके समर्थन में आ गए। हर्षा ने वीडियो जारी कर पहले भी कहा है कि उन्होंने संन्यास नहीं लिया। लेकिन दो सालों से वे संत जगत के सानिध्य में है, उनकी रुचियां आध्यात्मिक हो गईं हैं। इस समय वे कैलाशानंद के कुंभ शिविर में हैं और आहत होने पर अब वापस लौट जाना चाहती हैं। अब कुंभ का विराट महापर्व चल रहा है और संत जगत पूरे विश्व के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। परंपराओं के संरक्षण का महान कार्य अखाड़ों ने किया है। यद्यपि अतीत में भारी गलतियां भी अखाड़ों से हुई हैं। जैसे राधे मां को महामंडलेश्वर बनाना और विरोध के बाद फिर हटाना। जैसे महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा अय्याश बाबा नित्यानंद को महामंडलेश्वर बनाना और फिर किनारा करना। जैसा कि हमने कहा कुंभ जारी है। यह समय साधना, तपस्या और परंपराओं के दर्शन का समय है। हर्षा की रुचि यदि आध्यात्म में है तो कैलाशानंद करें उन्हें दीक्षित ? इसके बावजूद हर्षा की चर्चा इसलिए जारी है चूंकि वे सुंदर हैं और ग्लैमर वर्ल्ड से आईं हैं। तो क्या आज का भारतीय समाज श्रद्धा के महासागर में भगवा के बीच से भी सौंदर्य बोध तलाश रहा है ? आस्था बड़ी है या खूबसूरती ? क्या किसी आधुनिका को सांस्कृतिक आस्था रखना मना है ? ये प्रश्न अनुत्तरित हैं, जवाब अधूरे हैं। कुंभ समापन के बाद उन पर चर्चा करेंगे। दरसल यह अवसर हमारे उस रिच खगोलीय ज्ञान और उसके अनंत काल से अब तक प्रवाहमान बने रहने का जो गौरव की अनुभूति कराने का समय है उसे इन सतही खबरों ने बिल्कुल भुला दिया है। महाकुम्भ की कवरेज में केवल मनोरंजन और पब्लिसिटी दिखाया जा रहा है ना भक्ति ना सनातन का महात्म्य कही चर्चा में है तो कुम्भ को लोग मनोरंजन और सेल्फी के एंगल से देख और समझ रहे हैं।







