राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
स्मार्ट सिटी,,,कितनी स्मार्ट!
(लेख)
आश्चर्य जनक कड़वा सच,, तथाकथित स्मार्ट सिटी की दुर्गति, (ड्रेनेज सिस्टम और रोड) के बरसाती वीडियो देखकर लोग अपने तरीके से प्रतिक्रिया दे रहें हैं लेकिन सम्बंधित विभाग के एक भी दोषी अधिकारी/ कर्मचारी के विरुद्ध आज तक कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई न होना और लोकतंत्र के सभी स्तम्भों की खामोशी क्या दर्शाती है? यही न! सभी ने अपना ज़मीर बेच खाया है।
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स के फेल होने के मुख्य कारण तकनीक की कमी से ज्यादा गवर्नेंस, प्लानिंग, सामाजिक और वित्तीय समस्याओं से जुड़े होते हैं। दुनिया भर में और भारत के स्मार्ट सिटी मिशन दोनों में ये पैटर्न दिखते हैं।
इसके असफल होने कारण में
प्रथम कारण है हाई तकनीक को प्राथमिकता, लोगों की जरूरतों को अनदेखा करना कई परियोजनाएँ हाई-टेक सॉल्यूशंस (सेंसर, कमांड सेंटर, ऐप्स) पर फोकस करती हैं, जबकि आवास, ड्रेनेज, पानी, स्वास्थ्य या सामाजिक समावेश जैसी बुनियादी समस्याएँ पीछे रह जाती हैं। नतीजा दिखने वाला इंफ्रास्ट्रक्चर बन जाता है, लेकिन शहर की असली चुनौतियाँ हल नहीं होतीं।
दूसरा कारण गवर्नेंस और समन्वय की कमी
विभागों के बीच सिलो (अलग-अलग काम) और कम्युनिकेशन गैप कभी कम नहीं होता।
भारत में स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) मॉडल ने स्थानीय नगर निकायों को दरकिनार कर दिया, जिससे स्थानीय जिम्मेदारी और निरंतरता कमजोर हुई।
टॉप-डाउन निर्देश (केंद्र से) स्थानीय जरूरतों से मेल नहीं खाते। राजनीतिक बदलाव, अधिकारियों का ट्रांसफर और चुनाव चक्र भी प्रोजेक्ट्स को बाधित करते हैं।
प्लानिंग और स्थानीय संदर्भ की अनदेखी
एक-साइज-फिट्स-ऑल अप्रोच की स्थिति शहर की इतिहास, संस्कृति, भूगोल और लोगों की वास्तविक जरूरतों को नजरअंदाज करना।
ग्रीनफील्ड (नई) स्मार्ट सिटीज अक्सर “घोस्ट सिटी” बन जाती हैं क्योंकि लोग नहीं आते।
भारत में एरिया-बेस्ड डेवलपमेंट (ABD) पर ज्यादा फंड खर्च हुआ, जो शहर के छोटे हिस्से को कवर करता है, जबकि पैन-सिटी या बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर पीछे रह गया।
वित्तीय समस्याएँ और रखरखाव की कमी
बजट ओवररन, फंड का अधूरा उपयोग, PPP (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) का कमजोर प्रदर्शन है। प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट न होना ट्रैफिक सिग्नल, पाइपलाइन, स्मार्ट पोल आदि खराब हो जाते हैं। स्थानीय निकायों में क्षमता और लंबे समय तक फंड की कमी।
एक कारण है डेटा, प्राइवेसी और सुरक्षा मुद्दे डेटा सिस्टम इंटरऑपरेबल नहीं होते, प्राइवेसी सुरक्षा कमजोर होती है, और सार्वजनिक विश्वास कम हो जाता है। तकनीक असमानता बढ़ा सकती है (digital divide)।
नागरिक भागीदारी और सामाजिक प्रभाव की कमी होती है।
लोगों की भागीदारी कम होने से प्रोजेक्ट “टॉप-डाउन” रह जाते हैं। कभी-कभी विस्थापन, भूमि अधिग्रहण विवाद और असमान लाभ भी समस्या बनते हैं।
अपरिपक्व तकनीक और ओवर-प्रॉमिस
अभी विकसित हो रही तकनीकों (ऑटोनॉमस वाहन आदि) पर बहुत भरोसा कर लेना, या अपेक्षाएँ वास्तविक क्षमता से ज्यादा रखना।
भारत के संदर्भ में (Smart Cities Mission): फंडिंग असमान रही, कई प्रोजेक्ट्स अधूरे या देरी से पूरे हुए, ड्रेनेज जैसी बेसिक समस्याएँ बनी रहीं, और SPV मॉडल ने स्थानीय शासन को कमजोर किया। कुछ शहरों में प्रगति हुई, लेकिन कुल मिलाकर प्रभाव असमान और अधूरा रहा।
सफलता के लिए जरूरी लोगों-केंद्रित लक्ष्य, मजबूत स्थानीय गवर्नेंस, लंबे समय की मेंटेनेंस योजना, डेटा सुरक्षा, और वास्तविक जरूरतों पर आधारित प्लानिंग, तकनीक सिर्फ टूल है। शहर को “स्मार्ट” बनाने वाला असल कारक अच्छा शासन और नागरिक भागीदारी सुनिश्चित करना है।






