“तू दीपक हैं, तुझे जलना है, बुझना नहीं है”

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लेखिका/कवयित्री                                                    सुश्री सरोज कंसारी                                                  नवापारा राजिम                                                        रायपुर (छ. ग.)

                         (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)                                                  (w) 6395080071

                                  आलेख                                                                     ———–                                                                 “”””””””””””

        “तू दीपक हैं, तुझे जलना है, बुझना नहीं है”

                                     _सरोज कंसारी 

 

               

 

                दीपक का स्वाभाव होता हैं -अंधेरा हरना, औरों के जीवन को खामोशी से प्रकशित करना..सोचिए! कितना कठिन होता हैं -खुद जलना और दूसरों को खुशियां देना। किसी भटके को राह दिखाना, खुश रहने की वजह देना भी आज की सबसे बड़ी जरुरत हैं। दर्द के जहां कई वजह हैं, वहीं मरहम बन जाना कितना सुकून भरा कार्य हैं। आज जरूरत हैं तो समझने की मन की भावनाओं को। याद रखिए!मनुष्य जीवन को भी दीपक के जैसे दिव्य गुणों को अपनाने की जरूरत हैं”। तुम दीपक हो तुम्हे -सदैव जलते रहना हैं,”चाहें जिंदगी में कितने भी गम के तूफान आएं। खुद में साहस की लौ को बुझने नहीं देना हैं। हमें जिंदगी की समस्याओं से निराश नहीं होना हैं। व्यक्तित्व का विकास करते रहिए। जलना यानि-खुद को हर एक परिस्थिति से लड़ने के लिए तैयार करना। अच्छे गुणों को अपनाकर जीवन, को रोशन करना। जीवन की हर कठिनाइयों में हमें नया रास्ता बना लेना हैं। उम्मीद खोना नहीं हैं कभी, चाहें कुछ भी हो जाएं, सब्र का बांध नहीं टूटना चाहिए। वक्त के साथ कई बदलाव आते है। कुछ सफर जीवन के बेहद खूबसूरत होते हैं, जिसमें हम -खो जाना चाहते हैं.कुछ पल मौत से भी बदतर हो जाते हैं, वहीं हमें मुस्कुराना हैं और कोशिश कर आगे निकल जाना हैं। सरल को हल करना बड़ी बात नहीं, कठिन पल में हौसला रखना ही जीवन हैं। सुविधाओं में जी लेना सब जानते हैं पर असुविधा में भी रहने की आदत होना जरुरी हैं। इस सांसारिक जीवन में हमें हर पल जलना होता हैं। बिना समर्पण के आप जीवन को श्रेष्ठ नहीं कर सकतें। तू दीपक हैं तुझे जलना हैं। ओजस्वी- तेजस्वी और अलौकिक आनंद को प्राप्त करना हैं। जलना अर्थात -सांसारिक जीवन की कठिन तपस्या को पूर्ण करना। त्याग करना अपने सुख का औरो के लिए। दूसरों के दुख को महसूस करना। सेवा -सहयोग करना। सदकर्म से इस जीवन को साकार करना। भीतर के अंधकार को मिटाना, दुर्गणो का अंत औऱ सदगुणो का संचार करना ह्रदय में। सकारात्मक रहना, जिम्मेदारी निभाना होता हैं।

            जब हम दीपक की तरह बनेंगे, तभी उदासी का अंधेरा हटा पाएंगे। अपने व्यक्तित्व से औरो को प्रेरणा दीजिए। किसी के दिल में तकलीफ बन मत रहिए, सहारा बनिए। याद रखिए!आंसुओं की हर बूंद में आह! निकालती हैं। स्वार्थ -लालच में अंधे मत हो जाना। सच्चाई को किसी सहारे की जरूरत नहीं होती। किसी को तकलीफ देकर पाई गई खुशी की उम्र बहुत कम होती हैं। खामोश प्रार्थना की ताकत का अंदाजा लगाना मुश्किल हैं।कर्म वो करिए जिससे सहज ही दुआ निकले।

सदकर्मो का दिया बुझने मत देना।

         दीपक बन जलना -अर्थात अज्ञान को दूर करना। सोचने -समझने की क्षमता विकसित करना। जीवन की समस्याओं से लड़ना। निर्भीक होकर अपने कर्तव्य पथ पर खड़े होना होता हैं।

        कई बार हालात ऐसी निर्मित हो जाती हैं, जहां- मन बहुत दुखी होता हैं। बुरे खयाल आते हैं। जीने की चाह खत्म हो जाती हैं।आँख में आंसू, दिल में दर्द और चेहरे में सिर्फ चिंता की लकीरें होती हैं। लोगों के गलत व्यवहार से क्रोध- नफरत, बदले का भाव भी होता। समझना हैं हमें -हर मनुष्य का स्वभाव अलग होता हैं। अपनी राह खुद बनाइए। हमें सब्र की आदत रखनी हैं।खुद पर विश्वास करना हैं। कमजोर मन को फिर मजबूत कर जीना हैं। तकलीफ हमें अनुभव देती हैं। हमें हर कड़वाहट को भूलना हैं..

            बुझना नहीं हैं अर्थात -कभी घबराना नहीं। हार नहीं मानना औऱ किसी की बात से टूटना नहीं होता है। जिंदगी से दुखी होकर गलत कदम नहीं उठाना। बस दीपक के जैसे हर पल स्थिर रहना, अपने कर्म करते रहना।

               दीपक के जैसे संघर्ष करना हर परिस्थिति में। जो सहते हैं, वो कभी किसी हालात में रुकते नहीं। जो लड़ने के लिए तैयार हैं, वो कभी परिणाम की परवाह नहीं करते।

             जब दुनिया की भीड़ में खुद को अकेला महसूस करें तब-उस दीपक की ओर देखना! जो कभी हार नहीं मानता और अनवरत जलता हैं …हमें भी अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए साहस के साथ बढ़ना हैं। कष्ट तो मिलेंगे ही पर मन का साहस कभी बुझने न देना।

            निराश मन में उत्साह का दीपक जलाते रहना जरुरी हैं, तभी जीवन को सुखमय बना सकतें हैं। अंधेरा से लड़ने के लिए उम्मीद बनाएं रखिए, तभी जीवन में उजाला संभव हैं, नहीं तो दुखी होकर भटकते ही रहेंगे। हर पल नई जंग की तैयारी में रहिए।

         क्षणिक जीवन की कई दुखद कहानी होती हैं। मानव तन ईश्वर का आशीर्वाद हैं। जीवन के अंधेरा को मिटाकर, हर किसी के जीवन में सुख- समृद्धि और खुशियों की रोशनी करनी हैं। भूलिए मत! मिट्टी हैं यह तन, कब समय की आंधी में ढह जाएं और इसका अस्तित्व समाप्त हो जाएं कह नहीं सकते? अंधेरा बुराई हैं, अच्छाई रोशनी हैं। हमें रोशनी की की ओर जाने के लिए बुराई रूपी अंधेरा को मिटाते चलना हैं।

           जीवन के इस सफर में तुझे हर पल जलना हैं, मेहनत-संघर्ष, लगन और कोशिश से सब संभव हैं। मनुष्य हैं तुझमे ही तो अदम्य शक्ति हैं। डरकर पीछे मत जाना।

                “”””””””””””””””””””””””””

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