सुश्री सरोज कंसारी लेखिका एवं कवयित्री नवापारा राजिम, रायपुर (छ. ग)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड (w) 6395080071
आलेख ————-
रिश्तों की भूमि को प्यार की नमीं देकर उपजाऊ बनाइए
-सुश्री सरोज कंसारी
रिश्तों के एक सुंदर संसार में जन्म लेकर इन्हीं रिश्तों के साथ ही अंत होता हैं। जिसमें सुख की शीतल छांव तो, दुख की कड़ी धूप भी होती हैं। रिश्तों से निखरती हैं हर इंसान की शख्सियत। इसके बिना किसी भी मनुष्य के अस्तित्व की पहचान नहीं होती। रिश्तों के एक जाल में हम सभी उलझे होते हैं। जहां रहकर कभी आपसी कड़वाहट की घूंट मिलती हैं, तो कहीं स्नेह की शहद सी मिठास। कभी आपसी नोक-झोंक से तीखी लगती हैं तो रूठने और मनाने से यह चटपटी और स्वादिष्ट हो जाती हैं। रिश्तों की भूमि को प्यार की नमीं देकर उपजाऊ बनाना हैं या नफरत की दवा देकर बंजर यह परिवार के हर सदस्य की सोच पर निर्भर हैं।
युद्ध भूमि में दुश्मन सेें जंग जीतना आसान हैं। लेकिन परिवार की एकता शांत, सौम्यता को बनाएं रखने के लिए धैर्य रूपी हथियार की जरूरत होती हैं। सुबह से लेकर शाम तक मेहनत करने के बाद थकान से भरे शरीर और मन को विश्राम के लिए घर और अपनेपन की जरुरत होती हैं। जहां जाकर दिन भर के बोझिल मन को सुकून के कुछ पल मिलते हैं। परिवार के मुख्या अपनी नींद-चैन सुख सब कुछ त्याग कर हर किसी की जरूरत पूरी करने में लगे रहते हैं। जिससे घर के हर सदस्य की रोटी- कपड़ा, मकान, शिक्षा स्वास्थ्य और हर शौक पूरी कर सकें। विधाता ने बहुत सोच-समझकर इस सृष्टि में परिवार रूपी मंदिर की संरचना की हैं। जिसमें माता-पिता को भगवान के दूत के रूप में भेजा ताकी हर सदस्य के सुख-दुख को समझे और उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान करें। घर के हर सदस्य उनके भक्त होते हैं जहां विचारो के सामंजस्य, स्नेह करुणा, दया, ममता, वात्सल्य, सहानुभूति और संगठन से यह मंदिर पवित्र बनता हैं। परिवार में एक दूसरे की तकलीफ को समझना, मुसीबत में काम आना, एक दूसरे का मार्गदर्शन करना, उदासी को पढ़ना और हर कठिनाई में एकता का परिचय देना महत्त्वपूर्ण गुण होता हैं। तभी परिवार रूपी बगिया महकती हैं, जिसकी खुशबू चारो दिशा में फैलती हैं और स्वर्ग से सुंदर अनुभूति होती हैं उस परिवार में, और सुख- समृद्धि बनी रहती हैं।
लेकिन जहां आपस में भाई-भाई में एकता नहीं, देवरानी-जेठानी में मन मुटाव, सास-बहू के झगड़े, भाई-बहिन में लगाव नहीं, दिन-रात किसी न किसी बात को लेकर विवाद होते हैं, छोटी-छोटी बात मे झगड़े, मारपीट होते हैं, किसी मुद्दे पर बैठकर सुलह नहीं किया जाता, बड़ों का जहां आदर सम्मान नहीं होता, उस घर से सुख- शांति कोसो दूर हो जाती हैं। लक्ष्मी ठहरती नहीं दरिद्रता घर कर लेती हैं। परिवार रूपी मंदिर को सहेजकर रखना हर किसी की जिम्मेदारी होती हैं। एक साथ रहने से छोटी-बड़ी समस्या आती रहतीं हैं। अगर मिल- जुलकर समस्याओं का समाधान करने की चाहत हो तो हर विपत्ति दूर होती हैं। घर-घर की एक करुण कहानी होती हैं जहां अपने ही लोगो से बेरुखी मिलती हैं। ताने मिलते हैं विचारों में टकराव होता है, कई मुसीबतें आती हैं। लेकिन जो हर परिस्थिति में ढल जाते हैं, सहन करते हैं और अपनो को जोड़कर रखते हैं, परिवार को टूटने-बिखरने नहीं देते हर गम को अपनी अंतस की गहराई में छुपाकर रख लेते हैं, रिश्तों की दुनिया के सर्वश्रेष्ठ योद्धा वहीं बनते हैं।
जो इंसान अपने परिवार के लिए दुख-तकलीफ पीड़ा और दर्द सहन करते हैं, लेकिन जो परिवार को अंत तक टूटने से बचा लेते हैं उनकी जीत अवश्य होती हैं। हर किसी का प्रेम, स्नेह और अपनापन उन्हें मिलता ही है रिश्तों की मोती को जो पिरोकर रखने का हुनर रखते हैं। वे ईश्वर द्वारा प्रदत्त मनुष्य तन को सार्थक बनाते है और असल में सभी के आशिर्वाद से फलते-फूलते हैं।
अपनो से दूर रहकर जों जीने की चाह रखते हैं और अपना विकास चाहते हैं वे धन-दौलत शौहरत भले ही हासिल कर लेते हैं लेकिन रिश्तों की दुनिया में सबसे गरीब होते हैं। जो अपनो के दिल से उतर जाते हैं वो फिर कहीं के नहीं रह जाते। ऐसे इंसान का जीवन ही व्यर्थ होता हैं जो पारिवारिक जिम्मेदारी का निर्वहन करने मे असमर्थ होते हैं और स्वार्थ से वशीभूत होकर अपनी ही दुनिया में भौतिकता की चकाचौंध में लिप्त होकर विलासिता पूर्ण जीवन गुजारते हैं। धन्य हैं वह इंसान जो अपने पारिवारिक जिम्मेदारी से कभी पीछे नही हटते और आज आधुनिकता के युग में भी माता पिता, भाई-बहिन व अन्य रिश्तेनाते को समेटकर रखे हैं। उनकी परवाह करते हैं, सम्मान करते हैं ऐसे लोग दुख की हर दीवार को गिराकर प्रेम का सुंदर आशियाना बनाने में सफल है। एक मंदिर है परिवार और इस परिवार की जो भक्ती करते हैं समर्पण के पुष्प अर्पित कर अपनी आस्था श्रद्धा बनाएं रखते हैं, उनकी हर दुवाएं कबूल होती हैं।
कहते हैं रिश्तों को बचाएं रखने के लिए बहुत कुछ सहना सुनना और देखना पड़ता हैं। यह सच हैं पहले के समय में एक मुख्या के मार्गदर्शन में हर सदस्य नियम मर्यादा में रहते।परम्पराओं का निर्वहन करते, बहस-विवाद करने की हिम्मत नहीं करते चाहे। सास हो या बहू अनंत यातनाओं को सहनकर भी जीवन यापन करती, दूर से पानी भरकर लाना, चूल्हे में कई लोगो का खाना पकाना, घूंघट में रहना, सुबह से रात तक बिना रुके काम करना, गलती होने पर जली-कटी सुनना आम बात थी। आज समय बहुत बदला हैं कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं। जरा सी परेशानी हुई की शिकवे- शिकायत झगड़े बंटवारा, कोर्ट कचहरी, पंचायत तलाक के किस्से होते हैं। एकल परिवार का ठीक से निर्वहन करने में लोग असमर्थ हैं। तो संयुक्त परिवार की बात दूर हैं वो पीढ़ी थी जो बाप के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं करते थे गलती होने पर कांपते थे। चाहे किसी भी उम्र में हो सम्मान करते थे।
आज माहौल एकदम विपरीत हैं गलती भी करेंगे, बेरोजगार रहेंगे, जिम्मेदारी का निर्वहन भी नहीं करेंगे और माता-पिता से झगड़ा करने में सबसे आगे जमीन- जायजाद के बंटवारे और विवाद आज हर घर में हैं। आज के बेटो से बाप डरते हैं क्या नजराना है, रिश्तों का एक अलग ही अफसाना है। कहने को पारिवारिक भाव बस दिखावे में गुम जमाना हैं रिश्तों को बचाना आज की सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं। आप कितनी भी तरक्की कर लें अगर घर में पारिवारिक कलह हैं तो आपको कहीं भी सुख की प्राप्ति नहीं होंगी।
संभालकर रखें अपने परिवार को और इसे व्यवस्थित रखने के लिए अगर किसी से कोई गलती हो जाएं तो अधिक बेचैन और क्रोधित होने की बजाएं, समझदारी से काम लें।समझाने का प्रयास करें और न समझे तब अपनी आंख बंद कर ले, ऐसे रहे जैसे आपने कुछ देखा ही नहीं। किसी की बातें गर आपको चुभने लगे कटु लगें तो बहस न करें। आप शांत रहें अपने कान बंद कर ले और बहरे बन जाएं कुछ देर के लिए। अगर आपको किसी के व्यवहार पसंद नहीं आ रहे तनाव हो रहा अव्यावहारिक और मर्यादा विहीन बाते कोई कर दें तब आप उस स्थिति में कठोर बात न कहें मुंह बंद रखें जैसे आप गूंगे हैं। स्थिति ठीक होते तक ऐसा करें। माना ऐसे कर पाना बहुत ही दुखद और कठिन हैं। लेकिन आज की पीढ़ी में सहनशक्ति एकदम कम हैं। अगर आप चाहते हैं सभी को समेटकर रखना तो समय की यहीं मांग हैं परिवार रूपी नाव के आप श्रेष्ठ खेवैया बन पाएंगे।
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