सम्पादक रुद्रप्रयागः लक्ष्मण सिंह नेगी
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कल वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ शीतकाल के लिए बंद होंगे तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ के कपाट।
कपाट बंद होने की सभी तैयारियां पूरी।
शुभ लग्नानुसार संपन्न होगी कपाट बंद करने की प्रक्रिया।
प्रथम रात्रि प्रवास के लिए चोपता पहुंचेगी चल विग्रह उत्सव डोली।
8 नवम्बर को शीतकालीन गद्दीस्थल मक्कूमठ में होगी विराजमान।
ऊखीमठः हिमालय में सर्वाधिक ऊंचाई पर विराजमान तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ के कपाट शीतकाल के लिए बंद होने की घड़ियां नजदीक आ गई हैं। शुक्रवार, 6 नवम्बर को शुभ लग्नानुसार वैदिक मंत्रोच्चारण एवं धार्मिक परम्पराओं के निर्वहन के साथ तुंगनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाएंगे। कपाट बंद होने को लेकर मंदिर समिति द्वारा सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। कपाट बंद होने के बाद भगवान तुंगनाथ की चल विग्रह उत्सव डोली शीतकालीन गद्दीस्थल मक्कूमठ के लिए प्रस्थान करेगी। डोली के धाम से विदा होने के साथ ही इस वर्ष की यात्रा का समापन हो जाएगा।
मंदिर समिति के तुंगनाथ प्रबंधक प्रकाश पुरोहित ने बताया कि कपाट बंद करने की प्रक्रिया को लेकर मंदिर समिति की ओर से सभी व्यवस्थाएं पूरी कर ली गई हैं। शुक्रवार को निर्धारित शुभ मुहूर्त में विधि-विधान एवं वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच कपाट बंद किए जाएंगे। कपाट बंद होने के बाद भगवान तुंगनाथ की चल विग्रह उत्सव डोली प्रथम रात्रि प्रवास के लिए चोपता पहुंचेगी। यहां रात्रि विश्राम के बाद डोली अगले पड़ावों के लिए रवाना होगी तथा 7 नवम्बर को भगवान तुंगनाथ की चल विग्रह उत्सव डोली अन्तिम रात्रि प्रवास के लिए भनकुण्ड पहुंचेगी।
उन्होंने बताया कि निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार भगवान तुंगनाथ की उत्सव डोली विभिन्न यात्रा पड़ावों से होते हुए 8 नवम्बर को शीतकालीन गद्दीस्थल मक्कूमठ पहुंचेगी। यहां धार्मिक परम्पराओं एवं पूजा-अर्चना के साथ भगवान की डोली को विराजमान किया जाएगा। इसके बाद शीतकाल के दौरान मक्कूमठ में ही श्रद्धालुओं को भगवान तुंगनाथ के दर्शन करने का अवसर मिलेगा।
तुंगनाथ धाम के कपाट बंद होने के साथ ही उच्च हिमालयी क्षेत्र में शीतकालीन परिस्थितियों के चलते नियमित यात्रा गतिविधियां भी विराम ले लेंगी। वहीं, भगवान की उत्सव डोली के मक्कूमठ पहुंचने को लेकर क्षेत्रीय श्रद्धालुओं एवं स्थानीय लोगों में उत्साह बना हुआ है। शीतकालीन गद्दीस्थल में भगवान के विराजमान होने के बाद शीतकालीन पूजा-अर्चना की परम्पराएं विधिवत संचालित होंगी।






