राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
“कर्मफल”
(उपन्यास भाग- 21)
अक्टूबर 1983, मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम आने के बाद पूरे परिवार पर मानो दो रंगों की छतरी तन गई थी एक ओर चकाचौंध करती खुशी और दूसरी ओर गम के घने काले बादल। राजन का नाम चयनित अभ्यर्थियों की सूची में चमक रहा था। बैंक की छोटी-सी कोठरी में बैठा वह जब समाचार पत्र में परिणाम देख रहा था, तो उसके हाथ कांप गए, आँखों में आँसू थे, लेकिन वे खुशी के थे। उसने तुरंत तिली सागर एसटीडी वाले को फोन किया कि खुश खबरी मेरी को सुनकर बात करा दे,, एसटीडी वाला राजन का दोस्त अरुण जल्दी से हीरा फुआ के पास जाकर खबर सुनाया और फोन से माँ से बात कराया,,,
माँ का स्वर काँप रहा था
“बेटा… सच में पास हो गया तू?”
“हाँ माँ… पास हो गया।”
दूसरी तरफ सुमन का घर सन्नाटे में डूबा हुआ था। परिणाम की सूची में उसका नाम नहीं था। पिता जी चुपचाप गुड़ाखू घिस रहे थे। माँ रसोई में बर्तन धोते-धोते रुक-रुक कर आँखें पोंछ रही थीं। छोटी बहन साधना ने दीवार से पीठ टिकाए हुए फर्श को घूर रही थी। आस-पड़ोस की औरतें आँगन में खड़ी कानाफूसी कर रही थीं
“प्यार के चक्कर में पढ़ाई छोड़ दी होगी… अब देखो नतीजा!”
“लड़की इतनी होशियार थी… एक लड़के के पीछे सब बर्बाद कर दिया।”
सुमन ने ये बातें सुनीं,वह आँगन में खड़ी मुस्कुरा दी। आवाज में न शिकायत थी, न आक्रोश बस एक अजीब-सी शांति।
अभी तो फिल्म शुरू हुई है, उसने धीरे से कहा, “देखते जाओ… अंत अभी बाकी है, काकी।
उसके चेहरे पर न कोई शिकन थी, न पछतावा। जैसे वह किसी गहरी बात को जानती हो, जो बाकी लोगों की समझ से परे थी।
राजन अब बैंक की ड्यूटी के साथ-साथ राज्य सेवा के मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार की तैयारी में जुट गया था। सुबह छह बजे उठकर वह तीन घंटे पढ़ता, फिर बैंक जाता, शाम को लौटकर फिर किताबों में डूब जाता। हर महीने अपनी तनख्वाह का आधा हिस्सा घर भेज देता। माँ जब वह रुपए हाथ में लेतीं, तो आँखें भर आतीं।
“तेरे पिता जी… अब थोड़ा सुधर गए हैं,” माँ ने एक दिन धीरे से कहा था, “लेकिन अभी भी… कभी-कभी पुरानी संगति याद आ जाती है उन्हें।”
घर में भाई देवी की स्थिति अलग थी। हायर सेकेंडरी की परीक्षा सिर पर थी, लेकिन पढ़ाई से ज्यादा समय वह दोस्तों के साथ बर्बाद कर रहा था। शाम को जब राजन घर आता, तो देवी अक्सर घर पर नहीं मिलता। शाहिद और राजन दोनों ही समय-समय पर उसे समझाते “देवी, जिंदगी सिर्फ मौज-मस्ती नहीं होती, एक बार फिसल गए तो फिर उठना मुश्किल हो जाता है।”
लेकिन देवी झूठ बोलकर निकल जाता। कभी कहता कि लाइब्रेरी जा रहा है, कभी कहता कि किसी दोस्त के घर ग्रुप स्टडी है। असल में वह मुहल्ले के उन लड़कों के साथ घूमता रहता, जो नशे और जुए की दुनिया में पहले से ही डूबे हुए थे।
और सबसे भारी बात थी पिता जी की, गणेश अब फिर से मुहल्ले के नशेड़ियों के साथ उठने-बैठने लगे थे। कभी-कभी रात को देर से घर लौटते, तो उनके चेहरे पर नशे की छाप साफ दिखती। माँ चुपचाप सहन करतीं। राजन जब कभी कुछ कहने की कोशिश करता, तो पिता जी गुस्से में चिल्ला उठते तू नौकरी करने लगा है तो समझता है कि घर का मालिक बन गया? मैं अभी भी बाप हूँ!”
सुमन और साधना अब प्री-मेडिकल की तैयारी में पूरी तरह जुट गई थीं। दोनों बहनें एक ही कमरे में बैठकर रात-रात भर पढ़तीं। सुमन कभी-कभी बीच में रुक जाती और खिड़की के बाहर अँधेरे को निहारती रहती। साधना पूछती
“दीदी… तुम उदास हो क्या?”
सुमन मुस्कुराकर सिर हिला देती
“नहीं… बस सोच रही हूँ कि कर्म का पहिया कितनी तेजी से घूम रहा कोई आगे निकल जाता है, कोई पीछे रह जाता है… लेकिन रास्ता अभी खत्म नहीं हुआ,,छोटी !
एक तरफ राजन राजपत्रित अधिकारी बनने की ओर कदम बढ़ा रहा था, दूसरी तरफ सुमन चुपचाप अपनी असफलता को हथियार बनाकर नई लड़ाई लड़ रही थी। देवी की लापरवाही और पिता जी की पुरानी आदतें परिवार के अंदर एक नई दरार पैदा कर रही थीं और इन सबके बीच सुमन की वह एक पंक्ति बार-बार गूँजती रहती
“अभी तो फिल्म शुरू हुई है… देखते जाओ।”
क्या आगे आने वाला समय क्या गुल खिलाता है या धार धार आंसू रुलाता है।
(शेष अगला भाग कल)






