डा. सुधाकर आशावादी
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
व्यंग्य :
लोकतंत्र बचाओ अभियान
अभियान लोकतंत्र बचाने का है या अपने पैरों तले की जमीन। इसका समुचित उत्तर किसी के पास नहीं है, फिर भी दोनों पक्ष आमने सामने हैं। एक कह रहा है,कि लोकतंत्र खतरे में है। यह तानाशाही का रूप धारण करने की दिशा में अग्रसर है। दूसरा कह रहा है, कि लोकतंत्र खतरे में है, बिना सोच समझ वाले लोग अराजकता फैलाकर लोकतंत्र को नष्ट करना चाहते हैं। इसका अर्थ यही निकलता है, कि लोकतंत्र वास्तव में खतरे में है, दोनों पक्ष इस सत्य की पुष्टि करते हैं।
सवाल यह है, कि लोकतंत्र खतरे की जद में कैसे और कब आया ? क्या वास्तव में लोकतंत्र खतरे में है। यदि खतरे में है, तो इसे खतरे से मुक्त करने के लिए क्या प्रयास किये जा रहे हैं ? लोकतंत्र को खतरे में बताकर विरोध का झंडा बुलंद करने वाले मित्र से पूछा – महोदय, जब तक लोकतंत्र आपकी हवेलियों से संचालित होता था, क्या तब तक लोकतंत्र सुरक्षित था, उस पर कोई खतरा नहीं था। जब लोकतंत्र आपकी हवेली की कैद से मुक्त हुआ है, क्या तभी से खतरे में आया है ?
वह बोले – आप सच कहते हैं, तब लोकतंत्र सुरक्षित था, मेरे परिजनों ने लोकतंत्र को अपनी तिजोरी में सहेज कर रखा था, ताकि उस पर किसी की नजर न पड़े। अब जिसे देखो वही लोकतंत्र की दुहाई दे रहा है। खुले आम लोकतंत्र का अपहरण किया जा रहा है।
मैंने कहा – तो लोकतंत्र को खतरे से निकालने के लिए क्या प्रयास किए जाने चाहिए ? क्या लोकतंत्र को अपहरण से बचाने के लिए सुरक्षा बलों का पहरा कड़ा करना चाहिए ?
वह बोले – नहीं ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए। बस जो लोकतंत्र की चोरी करने के दोषी हैं, उन्हें जेल में डाला जाना चाहिए। लोकतंत्र को पुनः हमारी हवेली में आकर रहना चाहिए। हम ऐसा अवश्य करेंगे। हम खुली चुनौती देते हैं, कि लोकतंत्र के चोर हमारे सामने आत्मसमर्पण करें, हमें अपनी बेगुनाही के सबूत दें, फिर हम देखेंगे, कि हमें लोकतंत्र को किस प्रकार से बचाना है।
मैंने कहा – जिन्हें आप लोकतंत्र के चोर कह रहे हैं, वे भी लोकतंत्र बचाओ अभियान चला रहे हैं। जैसे आप सड़क पर हैं, वैसे ही वे भी सड़क पर आ रहे हैं।
मित्र महोदय खिलखिलाकर हँसे – अब समझे न … हम भी यही चाहते थे, कि लोकतंत्र को बचाने का ठेका जिनके पास है, वे खुद भी मान लें, कि लोकतंत्र खतरे में हैं, उन्होंने भी मान लिया, यह हमारी जीत की शुरुआत है।
मैंने कहा – मित्र , कौन सी दुनिया में जी रहे हो, वह कह रहे हैं, कि अराजक तत्व लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं को बाधित करके देश में अराजकता पैदा कर रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं पर झूठे आरोप लगाकर जनता को भ्रमित कर रहे हैं, इसलिए वे संवैधानिक मर्यादाओं, सुशासन और शांति का वातावरण बनाने के लिए जनजागरण अभियान चला रहे हैं। उनका नारा है – लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ।
मित्र महोदय के चेहरे पर कोई भाव नहीं था, सो वे बोले – मुझे बार बार यही फीलिंग आ रही है, कि लोकतंत्र चोरी हो गया है। यदि लोकतंत्र मेरी हवेली में आकर मेरी तिजोरी में नहीं रहता है, तो मैं सड़क पर उतरकर लोकतंत्र बचाओ आन्दोलन करता ही रहूँगा। (विनायक फीचर्स)






