राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल
(भाग 22)
कभी-कभी परिस्थिति इंसान की जिंदगी ही नहीं बल्कि पूरी दुनियां ही बदल देती है। आज राजन की मेहनत को एक ऐसा धक्का लगा जिसने उसकी पूरी दुनिया हिला गई। लोक सेवा आयोग के साक्षात्कार में वह कुछेक अंकों की कमी से फेल हो गया। सालों की रात-रात जागकर की गई तैयारी, सैकड़ों किताबें, अनगिनत मॉक टेस्ट सब कुछ एक झटके में बेकार हो गया। घर में क्या बोलेगा? परिणाम आने के बाद सुमन के परिवार का पूरा भरोसा राजन से उठ गया। पहले जो लोग उसके बारे में कहते थे “बेटा मेहनती है, एक दिन जरूर सफल होगा” वही अब सर हिला-हिलाकर कहने लगे “भाग्य में नहीं है तो मेहनत से क्या होगा?” बैंक बाबू बने रहिये।
इसी बीच सुमन का महिला पुलिस इंस्पेक्टर में चयन की खबर घर पहुँची तो मानो सुमन के घर वालों का घमंड सातवें आसमान में उड़ने लगा। पिताजी बार-बार कहने लगे अब हमारी बेटी इंस्पेक्टर है। बैंक बाबू उसके लायक नहीं रह गया। माँ चुपचाप सुनतीं, लेकिन उनकी आँखों में भी वही बात झलकती। रिश्तेदारों के फोन आने लगे। बधाइयाँ, सलाहें, और बीच-बीच में एक सवाल अब शादी का क्या सोच रहे हो?
सुमन खुद अपनी सफलता के लिए राजन को श्रेय देती रही। वह बार-बार कहती अगर तुमने मुझे नहीं पढ़ाया होता, अगर तुमने मेरा हौसला नहीं बढ़ाया होता, तो मैं यहाँ तक नहीं पहुँच पाती।” लेकिन घर का दबाव बढ़ता जा रहा था। राजन समझ गया कि अब वह इस घर में अधिक दिन नहीं रह सकता। एक दिन चुपचाप उसने अपना सामान समेटा और जहांगीराबाद में एक छोटे-से किराए के कमरे में शिफ्ट हो गया। कमरा छोटा था, दीवारें नम थीं, और खिड़की से पुलिस लाइन और जिला जेल भोपाल के घंटे की आवाज़ आती रहती थी। लेकिन कम से कम यहाँ कोई उसकी नाकामी का मजाक नहीं उड़ाता था।
पुलिस प्रशिक्षण अकादमी, सागर जाने से एक दिन पहले सुमन अचानक उसके कमरे में आई। दरवाज़ा खोलते ही दोनों एक-दूसरे को घूरते रहे। सुमन की आँखें नम थीं। राजन के चेहरे पर थकान और हार का मिश्रण साफ दिख रहा था। दोनों दो घंटों तक कमरे में बैठे रहे, कभी चुप, कभी बात करते हुए। दोनों के मन में एक ही सवाल घूम रहा था अब क्या करें?
अंत में सुमन ने हिम्मत करके ने स्पष्ट कहा
“मेरे घर वाले बहुत दबाव डाल रहे हैं, वे कहते हैं कि अब मेरी पोस्टिंग हो जाएगी तो शादी की बात अलग होगी। मेरी एक शर्त है …राजन! कि मेरी ट्रेनिंग पूरी होने तक हम आपस में नहीं मिलेंगे। और मेरी पोस्टिंग के एक साल बाद ही शादी करेंगे! ठीक है?
राजन कुछ देर चुप रहा बदले हालात / मौसम का ध्यान रखकर फिर धीरे से बोला- मैं भी एक शर्त रखता हूँ कि मार्च 84 को हम सगाई कर लेंगे और जून पचासी में शादी कर लेंगे। इससे पहले नहीं, इससे बाद भी नहीं। ”सुमन की आँखों में महंगे सपने तैरते दिखे, उसने सिर हिला दिया,,“नहीं। मैं अपनी शर्त नहीं तोड़ सकती हूँ। आप समझ नहीं रहे… कि मैं अपने घर वालों का दिल नहीं तोड़ सकती, वे मेरी सफलता पर इतना गर्व कर रहे हैं। अगर मैं अभी तुम्हारे साथ खड़ी हो गई तो वे कहेंगे कि मैंने सब कुछ गँवा दिया।
राजन कुछ कहना चाहता था, लेकिन शब्द नहीं निकले, सुमन उठ खड़ी हुई, दरवाज़े के पास जाकर उसने मुड़कर देखा। आवाज़ में गुस्सा और दर्द दोनों थे,, मैं जा रही हूँ, राजन! तुम्हारी जिंदगी और अपनी आशिकी के लिए मैं अपने घर वालों का दिल नहीं तोड़ सकती।
दरवाजा बंद क्या हुआ राजन के दिल दिमाग में सन्नाटा छा गया। कमरे में सिर्फ जिला जेल के घंटे की आवाज आ रही थी,, शायद दोपहर के बारह घंटे बजे थे,, या राजन की जिन्दगी के बारह बज चुके थे। राजन खिड़की के पास जाकर बैठा। रूम में अँधेरा गहरा रहा था, आंखों के किनारे सूख ही नहीं रहें हैं। उसने महसूस किया कि कर्मफल कभी-कभी मेहनत से नहीं, परिस्थितियों से तय होता है और परिस्थितियाँ आज उसके खिलाफ खड़ी हैं कि एक बैंक बाबू , वर्दी वाली महिला पुलिस निरीक्षक से कैसे निभा सकता है? लोग क्या कहेंगे? अरे! प्यार है तो क्या ? पद भी तो देखना जरूरी है।
(आगे का भाग कल)







