हरी राम यादव
बनघुसरा, अयोध्या
(नया अध्याय, देहरादून)
करो न किसी संग घात
कुल घाती को कभी नहीं,
मिला जगत में सम्मान।
चाहे ताना घाती मित्र ने
सिर उसके स्वर्ण वितान।
सिर उसके स्वर्ण वितान,
मान कभी न उसने पाया।
धोखेबाज, अवसरवादी,
शब्द सदा हिस्से आया ।
निज हित कभी जगत में,
न करो किसी संग घात।
जिसके संग गये हो तुम,
उसका है मतलब तक नात ।।







