किंकर्तव्यविमूढ़ लोक की नियति और संवाद की पुनर्स्थापना।

Spread the love

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव

 

           (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

किंकर्तव्यविमूढ़ लोक की नियति और संवाद की पुनर्स्थापना।

 

 

 

राजतंत्र की राजनीति का एक स्पष्ट और स्वीकृत सिद्धांत रहा है, दंड विधान। वहाँ शत्रु और मित्र की परिभाषाएं सीमाओं, सिंहासनों और संधियों से तय होती थीं। जब राजनीतिक शत्रुओं को परास्त या समाप्त करने की बात आती थी, तो उसे व्यक्तिगत या सामाजिक हिंसा की श्रेणी में न रखकर ‘युद्ध’ का गौरवपूर्ण नाम दिया जाता था। वह एक व्यवस्था थी जहाँ दो सेनाएं आमने-सामने होती थीं, जिसके कुछ नियम-उपनियम होते थे। यहाँ तक कि जब भाई-भाई आपस में टकराए, तो उस महाविनाशकारी पारिवारिक युद्ध को भी ‘धर्मयुद्ध’ की संज्ञा दी गई, क्योंकि वहाँ न्याय, अधिकार और नीति की स्थापना का एक वृहत्तर उद्देश्य सामने था। यह राजतंत्र की राजनीति की वह रूपरेखा थी, जहाँ हिंसा को एक व्यापक सामाजिक अनुशासन और संप्रभुता के उपकरण के रूप में देखा जाता था किंतु समय बदला, व्यवस्थाएं बदलीं और हम राजतंत्र के गलियारों से निकलकर लोकतंत्र के खुले आंगन में आए। लोकतंत्र , जिसके मूल में लोक की सहमति, सहिष्णुता, संवाद और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना निहित थी।

जहाँ यह माना गया था कि अब सत्ता का फैसला तलवार की धार से नहीं, बल्कि मतपेटी की पर्ची से होगा। जहाँ वैचारिक मतभिन्नता को शत्रुता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की खूबसूरती माना गया। परंतु आज जब हम अपने चारों ओर की समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों का अवलोकन करते हैं, तो एक गहरी टीस और निराशा मन को घेर लेती है।

ऐसा प्रतीत होता है कि नीतियां बदल गई हैं, और उनके साथ ही लोकतंत्र की आत्मा भी लहूलुहान हो रही है। लोकतंत्र का हिंसा भरा बदलता स्वरूप एक गंभीर चुनौती है।

आज जो परिदृश्य हमारे सामने है, वह लोकतंत्र की मूल भावनाओं को ही चुनौती दे रहा है। चुनाव के दौरान होने वाली हिंसा, और भय का माहौल अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि कई क्षेत्रों में एक स्थापित परिपाटी बनते जा रहे हैं।

हिंसा का यह तांडव केवल चुनाव की घोषणा से लेकर मतदान के दिन तक सीमित नहीं रहता। अब एक नया चलन शुरू हुआ है , चुनाव के बाद की हिंसा। वैचारिक रूप से पराजित दल या विजयी दल के उन्मादी तत्व एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। घरों को जलाना, विरोधी विचारधारा के समर्थकों को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करना, मानो इस बात का उद्घोष है कि हम लोकतांत्रिक प्रक्रिया में तो विश्वास रखते हैं, लेकिन उसके परिणामों को स्वीकार करने का धैर्य और बड़प्पन खो चुके हैं।

इससे भी आगे बढ़कर, जब हम सामाजिक ताने बाने को देखते हैं, तो पाते हैं कि हिंसा ने नए नए मुखौटे लगा लिए हैं। कहीं ‘अधिकार’ के नाम पर सड़कों को बंधक बना लिया जाता है, सार्वजनिक संपत्ति को स्वाहा कर दिया जाता है, तो कहीं ‘जाति’ और ‘धर्म’ के नाम पर सदियों पुराने भाईचारे को एक झटके में भस्म कर दिया जाता है।

अपनी जायज नाजायज मांगों को मनवाने के लिए राज्य को घुटनों पर लाने की यह प्रवृत्ति अंततः समाज के सबसे कमजोर तबके को ही चोट पहुँचाती है। अधिकार की रक्षा के नाम पर शुरू हुआ आंदोलन कब अराजकता और हिंसा का पर्याय बन जाता है, पता ही नहीं चलता। इन सब दृश्यों को देखकर अंतरात्मा से यह सवाल उठता है कि क्या हम सचमुच एक परिपक्व लोकतंत्र हैं, या हमारा लोकतंत्र धीरे धीरे एक क्रूर ‘हिंसातंत्र’ में परिवर्तित होता जा रहा है?

इस पूरे परिदृश्य में दुखद और विचारणीय स्थिति में है,वही ‘लोक’ जो इस तंत्र का स्वामी है, जो आज पूरी तरह से ‘किंकर्तव्यविमूढ़’ है। वह स्तब्ध है, मौन है और असहाय है। उसे समझ नहीं आ रहा कि जिस तंत्र को उसने अपनी नियति बदलने के लिए चुना था, वह तंत्र स्वयं उसकी सुरक्षा और शांति के लिए खतरा कैसे बन गया? जब वह टीवी चैनलों पर, सोशल मीडिया पर और अपने आस-पड़ोस में जाति, भाषा और राजनैतिक दल के नाम पर अपनों को ही अपनों से लड़ते देखता है, तो उसकी सोचने-समझने की शक्ति कुंद हो जाती है। वह यह तय नहीं कर पाता कि इस हिंसातंत्र के खिलाफ आवाज उठाए तो कैसे, क्योंकि तंत्र के ठेकेदार इतने शक्तिशाली और हिंसक हो चुके हैं कि आम नागरिक का विवेक उनके शोर और बारूद के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो जाता है।

राजतंत्र में तो प्रजा राजा के दंड विधान की सीमाओं से बंधी थी और उसे ही अपनी नियति मानती थी। किंतु लोकतंत्र में जब जनता स्वयं शासक चुनने का अधिकार रखती हो, तब उसका इस कदर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाना एक गंभीर खतरे की घंटी है। यह स्थिति तब पैदा होती है जब संवाद के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं और केवल ‘बाहुबल’ ही विमर्श का एकमात्र माध्यम बन जाता है।

नागरिक स्तर पर संवाद की बहाली ही वह रास्ता बचता है जो कुछ समाधान निकाल सकता है।

यदि लोकतंत्र का हृदय ‘लोक’ है, तो उसकी धड़कन निश्चित रूप से ‘संवाद’ है। जब तक समाज में संवाद जीवित रहता है, तब तक मतभेद कभी भी मनभेद या हिंसा का रूप नहीं ले सकते। वर्तमान समय में सोशल मीडिया के ‘इको चैंबर’ और राजनीतिक ध्रुवीकरण ने नागरिकों के बीच बातचीत के पुलों को ध्वस्त कर दिया है। लोग अब एक-दूसरे से बात नहीं कर रहे, बल्कि एक-दूसरे पर चिल्ला रहे हैं, और हिंसा भरा व्यवहार कर रहे हैं। इस ‘हिंसातंत्र’ की अंधी खाई से बाहर निकलने और लोक को कर्तव्य-बोध की ओर ले जाने के लिए हमें नागरिक स्तर पर कुछ व्यावहारिक उपाय करने होंगे, प्राचीन काल की चौपाल परंपरा की तर्ज पर गैर-राजनीतिक मंच तैयार किए जाएं, जहाँ दलगत राजनीति से ऊपर उठकर केवल स्थानीय विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक समरसता पर बात हो। जब नागरिक पड़ोसी के नाते आपस में बैठेंगे, तो राजनीतिक दलों द्वारा खड़ी की गई कृत्रिम दीवारें स्वतः ढहने लगेंगी।

आज हिंसा का एक बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से उपजता है। नागरिकों को यह सिखाना होगा कि वे सूचनाओं को आंखें मूंदकर ‘फॉरवर्ड’ न करें, बल्कि उनकी सत्यता को फैक्ट चेक पर परखें। हमें विरोधी विचारों को केवल उत्तर देने के लिए नहीं, बल्कि उनके पीछे की चिंताओं को समझने के लिए सुनना होगा।

प्रत्येक संवेदनशील क्षेत्र में साहित्यकारों, प्रबुद्ध नागरिकों, शिक्षकों और युवाओं को मिलाकर ‘सद्भाव समितियां’ बनाई जानी चाहिए, जो किसी भी तनावपूर्ण स्थिति में अफवाहों को फैलने से रोकें और सीधे संवाद के जरिए गतिरोध को समाप्त करें।

हमारी शिक्षा व्यवस्था में वाद-विवाद को केवल प्रतियोगिता न मानकर, उसे सहमति और असहमति के सह-अस्तित्व के पाठ के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। युवाओं को यह सिखाया जाना अनिवार्य है कि वैचारिक असहमति का अर्थ व्यक्तिगत घृणा नहीं होता।

अनेकांतवाद का जैन दर्शन,हमें सिखाता है कि सत्य के कई पहलू हो सकते हैं। लोकतंत्र में तुम्हारी बात भी सही हो सकती है और सामने वाले की बात भी। जब लोक इस सत्य को स्वीकार कर लेगा, तो हिंसा का वैचारिक आधार समाप्त हो जाएगा।

लोकतंत्र को हिंसातंत्र बनने से रोकने की जिम्मेदारी किसी सरकार या पुलिस तंत्र पर छोड़कर हम निश्चिंत नहीं हो सकते। यह लड़ाई हर नागरिक को अपने घर, अपने मोहल्ले और अपनी सोच से शुरू करनी होगी। हमें राजतंत्र के उस ‘युद्ध’ और ‘धर्मयुद्ध’ के दर्शन से सीख लेते हुए यह समझना होगा कि लोकतंत्र में असली धर्मयुद्ध ‘हिंसा’ नहीं, बल्कि ‘सद्भाव और संवाद’ है।

जब आम नागरिक राजनीतिक दलों के ‘लाठी तंत्र’ को ठुकराकर ‘संवाद तंत्र’ को गले लगाएगा, तभी लोक की वास्तविक संप्रभुता बहाल होगी।

यदि आज हम चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें एक ऐसा समाज सौंपने के लिए कभी माफ नहीं करेंगी जहाँ मतभेदों का फैसला तर्कों से नहीं, बल्कि लाठियों और गोलियों से होता हो। इस वैचारिक शून्यता को भरने का प्रयास अखबार, और साहित्य कर सकते हैं। लोक को उसकी वास्तविक शक्ति का स्मरण कराना ही होगा ।    (विनायक फीचर्स)

  • Related Posts

    संकल्प, साधना और सेवा के प्रेरणा पुञ्ज नरेन्द्र मोदी

    Spread the love

    Spread the love​ विष्णु दत्त शर्मा (लेखक राष्ट्रीय संयोजक, प्रकोष्ठ संकुल भाजपा एवं खजुराहो लोकसभा से सांसद हैं।)                     नया अध्याय,…

    नरेंद्र मोदी जी केवल प्रधानमंत्री ही नहीं, सेवा और साधना में रत एक व्यक्तित्व

    Spread the love

    Spread the love    लेखिका: सुश्री सरोज कंसारी (कवयित्री, लेखिका व शिक्षिका) रिपोर्टर एवं उद्घोषिका नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)                       (नया…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    अल्मोड़ा में मां नंदादेवी मेले का विधिवत शुभारंभ, दीप प्रज्वलन से हुआ आगाज।

    • By User
    • September 16, 2026
    • 6 views
    अल्मोड़ा में मां नंदादेवी मेले का विधिवत शुभारंभ, दीप प्रज्वलन से हुआ आगाज।

    विधिक सेवा के अध्यक्ष श्रीकांत पांडे के तत्वाधान में जागरूकता शिविर का‌ आयोजन।

    • By User
    • September 16, 2026
    • 11 views
    विधिक सेवा के अध्यक्ष श्रीकांत पांडे के तत्वाधान में जागरूकता शिविर का‌ आयोजन।

    अल्मोड़ा पुलिस के महिला कोतवाली, थाना धौलछीना एवं थाना सल्ट ने चलाया जनजागरूकता अभियान।

    • By User
    • September 16, 2026
    • 6 views
    अल्मोड़ा पुलिस के महिला कोतवाली, थाना धौलछीना एवं थाना सल्ट ने चलाया जनजागरूकता अभियान।

    संकल्प, साधना और सेवा के प्रेरणा पुञ्ज नरेन्द्र मोदी

    • By User
    • September 16, 2026
    • 11 views
    संकल्प, साधना और सेवा के प्रेरणा पुञ्ज नरेन्द्र मोदी

    नरेंद्र मोदी जी केवल प्रधानमंत्री ही नहीं, सेवा और साधना में रत एक व्यक्तित्व

    • By User
    • September 16, 2026
    • 11 views
    नरेंद्र मोदी जी केवल प्रधानमंत्री ही नहीं, सेवा और साधना में रत एक व्यक्तित्व

    दस सूत्रीय मांगों को लेकर प्रधान संगठन ने ब्लॉक मुख्यालय पर की तालाबंदी। 

    • By User
    • September 16, 2026
    • 11 views
    दस सूत्रीय मांगों को लेकर प्रधान संगठन ने ब्लॉक मुख्यालय पर की तालाबंदी।