धीमा न्याय निर्भयाओं को कर रहा कमजोर हैवानियत को अंजाम तक पहुंचना चाहिए।

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प्रियंका सौरभ,  रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, हिसार (हरियाणा)

          धीमा न्याय निर्भयाओं को कर रहा कमजोर

हैवानियत को अंजाम तक पहुंचना चाहिए।

 

महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा में संस्थागत कारकों में अपर्याप्त संसाधन वाले पुलिस बल और अप्रभावी कानून प्रवर्तन सहित संस्थागत विफलताएं ,महिलाओं के खिलाफ हिंसा के जारी रहने में योगदान करती हैं। अक्सर, मामले या तो दर्ज नहीं किए जाते हैं या पूरी तरह से जांच नहीं की जाती है , जिससे सजा की दर कम होती है। 2012 में निर्भया मामले में हुई कथित देरी ने पुलिस प्रक्रियाओं और कानून प्रवर्तन में महत्वपूर्ण खामियों को उजागर किया, जिससे व्यापक सार्वजनिक आक्रोश हुआ। धीमी न्यायिक प्रक्रिया और लंबित मामले महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों की प्रभावशीलता को कमज़ोर करते हैं। विलंबित न्याय अक्सर पीड़ितों को कानूनी मदद लेने से हतोत्साहित करता है और अपराधियों को सज़ा से बचने का मौक़ा देता है । 2012 के निर्भया मामले में अभियुक्तों के मुक़दमे में लगभग आठ साल लग गए, जो महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों में न्याय की सुस्त गति को दर्शाता है।

कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम (2013) जैसे प्रगतिशील कानूनों के अस्तित्व के बावजूद, निगरानी , जवाबदेही और संस्थागत समर्थन की कमी के कारण उनका कार्यान्वयन कमज़ोर बना हुआ है। राष्ट्रीय महिला आयोग के एक अध्ययन में पाया गया कि कई कार्यस्थलों में आंतरिक शिकायत समितियों का अभाव है , जो यौन उत्पीड़न अधिनियम को लागू करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। संस्थाओं के भीतर भ्रष्टाचार, हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय में बाधा उत्पन्न कर सकता है, तथा प्रभावशाली अपराधी अक्सर रिश्वत या राजनीतिक संबंधों के माध्यम से कानूनी परिणामों से बच निकलते हैं। कई कानून प्रवर्तन अधिकारियों और न्यायिक कर्मियों में लैंगिक मुद्दों पर पर्याप्त प्रशिक्षण और संवेदनशीलता का अभाव है, जिसके कारण पीड़ित को ही दोषी ठहराने की प्रवृत्ति पैदा होती है और महिलाओं के खिलाफ हिंसा से संबंधित मामलों का अनुचित तरीके से निपटारा होता है।

पुरुषों के वर्चस्व और महिलाओं पर नियंत्रण को प्राथमिकता देने वाले पितृसत्तात्मक मानदंड ,महिलाओं के खिलाफ हिंसा के जारी रहने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। ये मानदंड अक्सर अपमानजनक व्यवहार को उचित ठहराते हैं या कम करते हैं, परिवार के पुरुष सदस्यों पर आर्थिक निर्भरता अक्सर महिलाओं को हिंसा सहने के लिए मजबूर करती है, क्योंकि अपमानजनक स्थिति से बाहर निकलने पर वित्तीय अस्थिरता या अभाव हो सकता है। विशेषकर यौन हिंसा के पीड़ितों को अक्सर सामाजिक कलंक और बहिष्कार का सामना करना पड़ता है, जो उन्हें अपराधों की रिपोर्ट करने या न्याय मांगने से हतोत्साहित करता है। मीडिया में महिलाओं और हिंसा के बारे में प्रस्तुतीकरण अक्सर मामलों को सनसनीखेज बना देता है, कभी-कभी मुद्दे की गंभीरता को कमतर आंकता है या पीड़ितों के बारे में नकारात्मक रूढ़िवादिता को मजबूत करता है। विशेष रूप से यौन हिंसा की रिपोर्टिंग से होने वाले रुढ़िवादी सांस्कृतिक कलंक के कारण कम रिपोर्टिंग होती है, जिससे महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों के प्रवर्तन में बाधा आती है। यौन हिंसा की अनुमानित घटनाओं और रिपोर्ट किए गए मामलों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाता है, जो रिपोर्टिंग में सांस्कृतिक बाधाओं को उजागर करता है। अपर्याप्त फंडिंग और स्टाफिंग सहित संस्थागत संसाधन की कमी , कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों का जवाब देने की क्षमता को सीमित करती है। कई पुलिस स्टेशनों, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों को संभालने के लिए समर्पित महिला अधिकारियों या विशेष प्रकोष्ठों की कमी है , जिसके कारण मामले को ठीक से नहीं निपटा जा पाता है। राजनीतिक प्रभाव और भ्रष्टाचार के कारण अक्सर कानूनों का चयनात्मक प्रवर्तन होता है , जहां शक्तिशाली व्यक्तियों से जुड़े मामलों को या तो दबा दिया जाता है या खराब तरीके से जांच की जाती है। महिलाओं में कानूनी जागरूकता की कमी, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, न्याय पाने की उनकी क्षमता को सीमित करती है और इसके परिणामस्वरूप उन्हें बचाने के लिए बनाए गए कानूनों का कम उपयोग होता है। कई महिलाएं महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम 2005 जैसे कानूनों के तहत अपने अधिकारों से अनजान हैं , जिसके कारण रिपोर्ट करने और कानूनी सहारा लेने की दर कम है।

महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए प्रशिक्षण , संवेदनशीलता और संसाधन आवंटन के माध्यम से कानून प्रवर्तन एजेंसियों की क्षमता को बढ़ाना महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए: पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो द्वारा आयोजित पुलिस अधिकारियों के लिए नियमित लिंग संवेदनशीलता प्रशिक्षण कार्यक्रम , महिलाओं के खिलाफ हिंसा से संबंधित मामलों से निपटने में सुधार कर सकते हैं। व्यावसायिक प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर प्रदान करने जैसी आर्थिक सशक्तिकरण पहल , महिलाओं की अपमानजनक रिश्तों पर निर्भरता को कम कर सकती है और उन्हें अपने अधिकारों का दावा करने में सक्षम बना सकती है। सरकार और नागरिक समाज संगठनों को महिलाओं के बीच कानूनी साक्षरता बढ़ाने के लिए मिलकर काम करना चाहिए, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, ताकि वे अपने अधिकारों और उनके लिए उपलब्ध कानूनी रास्तों के बारे में जागरूक हों। महिला अधिकार पहल जैसे गैर सरकारी संगठनों द्वारा आयोजित कानूनी जागरूकता शिविर महिलाओं को घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम 2005 जैसे कानूनों के बारे में शिक्षित करने में मदद करते हैं ।

सामुदायिक सहभागिता कार्यक्रम जो पितृसत्तात्मक मानदंडों को चुनौती देते हैं और लैंगिक समानता को बढ़ावा देते हैं , एक सांस्कृतिक बदलाव ला सकते हैं जो महिलाओं के खिलाफ हिंसा को हतोत्साहित करता है। संस्थानों के अंतर्गत मजबूत निगरानी और जवाबदेही तंत्र स्थापित करने से यह सुनिश्चित हो सकता है कि कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और किसी भी चूक को तुरंत संबोधित किया जाए। कार्यस्थलों पर आंतरिक शिकायत समितियों की स्थापना , जैसा कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम 2013 द्वारा अनिवार्य है , अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए नियमित ऑडिट के साथ, कानून की प्रभावशीलता में सुधार कर सकता है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मुद्दे को संबोधित करने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो संस्थागत और सामाजिक दोनों कारकों से निपटता है। कानून प्रवर्तन को मजबूत करना, महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और सांस्कृतिक परिवर्तन को बढ़ावा देना महिलाओं के लिए एक सुरक्षित वातावरण बनाने की दिशा में आवश्यक कदम हैं । सरकार, नागरिक समाज और समुदायों के ठोस प्रयासों से, भारत एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ सकता है जहाँ महिलाएँ भय और हिंसा से मुक्त रहें , उनके अधिकार और सम्मान पूरी तरह सुरक्षित हों ।

 

 

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