राजकुमार कुम्भज, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
कहीं कुछ अप्रासंगिक तो नहीं?
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किस-किस दिमाग से नक्सलवाद खत्म किया जाएगा?
इस वक्त तो देश का बच्चा-बच्चा नक्सल प्रभावित हो रहा है, शिक्षक हैं नहीं, हैं तो पढ़ाते नहीं हैं, पढ़ाते हैं तो मनगढ़ंत पढ़ाते हैं। मनगढ़ंत पढ़ाते हैं, तो ऐसी-ऐसी पाखंडी और झूठी कहानियाॅं पढ़ाते हैं, जिनका संबंध न तो कहीं किसी पाठ्यक्रम से होता है और न कहीं किसी परीक्षा से?
सरकार खुद नहीं चाहती है कि बच्चे स्कूल जाऍं? इसीलिए तकरीबन एक लाख स्कूल बंद कर दिए गए हैं और जो उपलब्ध हैं, वे पुरातत्व सर्वेक्षण का दर्जा तथा दावा करने तक के काबिल नहीं हैं। अगर ये बच्चे बेक़ाबू हुए बिना बिंदास अंदाज में अपनी शिकायत लेकर सड़क पर उतर आते हैं,तो सरकार के मुताबिक नक्सल-दिमाग़ हुए?
भयंकर भ्रष्टाचार पीड़ित कोई भी नागरिक (अंधे-बहरे शासन-प्रशासन तक) अपना रोष, अपना दुखड़ा, अपना विधिसम्मत कष्ट, हर किसी जगह से निराश होने के बाद, अगर विरोध में विषयोचित चीखता-चिल्लाता है, कपड़े फेंक देता है, जूता-स्याही जैसा कुछ फेंक देता है, तो सरकार की नजर में नक्सली-दिमाग़ है?
ऐसे पहचानहीन बहुतेरे परेशान नागरिक-जन हैं, जिनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
इसी पीड़ा के कारण उनका सामान्य जीवन सामान्यत: नारकीय बना हुआ है।
क्या करें ये लोग? कहाँ जाएँ ये लोग? किसको बताएँ ‘मन की बात’? क्या ये सभी नक्सली कहे जाएँगे? क्या ये भी नक्सलवाद से प्रभावित हैं?
अगर ऐसा है, तब तो संपूर्ण देश ही नक्सल कहलाएगा। फैसला आपका है, स्वागत रहेगा।
किसी भी देश के नागरिक-जन, सरकार के फैसलों का (असहमत होते हुए भी) स्वागत करने के लिए बाध्य हैं और जो कोई भी विरुद्ध जाता है अथवा विरुद्ध जाने की कोशिश करता है, उसे आसानी से नक्सली-दिमाग करार दिया जा सकता है। ये असंभव तो नहीं?
किन्तु क्या किसी लोकतांत्रिक-व्यवस्था में इस अवधारणा को मान्य किया जा सकता है?
कहीं कुछ अप्रासंगिक तो नहीं हो रहा है?







