डॉ0 हरि नाथ मिश्र
(पूर्व विभागाध्यक्ष-अंग्रेजी)
का0 सु0 साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
अयोध्या, (उ0प्र0)
(नया अध्याय, देहरादून)
कुछ दोहे
सुरभित मधुरालय खुले, लंबी लगी कतार।
भूल गए सब मुदित मन, कोरोना का वार।।
चावल-आटा-दाल की, चिंता छोड़ जनाब।
जा पहुँचे मधु-द्वार पर, घर की दशा खराब।।
डंडा-सोटा-स्वाद ले, डटे रहे पुरजोर ।
बोतल बंद शराब ने, दिया प्रशासन झोर।।
बिना चुकाए दाम ही, राशन दे सरकार।
पुनः वसूले मूल्य वह, खोल जेब के द्वार।।
दिखीं बहुत सी देवियाँ, मय-मंदिर के द्वार।
वित्त लिए निज पर्स में, नारी-शक्ति अपार।।
अपनी भाग्य सराहते, दिखे सभी मधु-केंद्र।
क्या राजा,क्या रंक है, खड़े दिखे धर्मेंद्र।।
सीना ताने गर्व से, मुदित सुता अंगूर।
मानो यह कहती फिरे, मानव-मन लंगूर।।
पल-भर के सुख के लिए, घोर करे अपराध।
जीवन से खिलवाड़ कर, करे पाप निर्बाध।।
माना मानव सभ्य है, यह संस्कृति-आधार।
किंतु कभी विपरीत हो, खोए शुद्ध विचार।।







