राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मतलबी लोग!
(कहानी)
रामपुर कस्बे के एक छोटे-से मकान में मध्यम वर्गीय परिवार रहता था। पिता श्रीकांत स्कूल में अध्यापक थे, पत्नी सुमित्रा गृहस्थी संभालती थीं, बेटा राहुल कॉलेज जाता था और बेटी प्रिया दसवीं कक्षा में पढ़ती थी। बाहर से देखने पर यह परिवार बिल्कुल सामान्य लगता था लेकिन घर के अंदर छोटी-बड़ी बातें रोजाना होती रहती थीं। कभी राहुल टीवी की आवाज तेज रखता तो प्रिया चिल्ला उठती, “भैया, पढ़ने दो!” कभी सुमित्रा सब्जी में नमक ज्यादा डाल देतीं तो श्रीकांत मुँह बनाते हुए कहते, “आजकल स्वाद ही नहीं आता।” पैसे की बात हो या छुट्टी मनाने की योजना हर छोटी-बड़ी अच्छी-बुरी बात पर मतभेद हो ही जाता। कभी-कभी झगड़ा इतना बढ़ जाता कि सब अपने-अपने कमरे में चले जाते और घर में सन्नाटा छा जाता।
एक शाम अचानक सब कुछ बदल गया। श्रीकांत साहब को स्कूल से लौटते समय अचानक तेज सीने में दर्द हुआ वे सड़क पर गिर पड़े। पड़ोसियों ने अस्पताल पहुँचाया, डॉक्टरों ने बताया हृदय की नस में रुकावट है तुरंत ऑपरेशन ज़रूरी है खर्चा काफी ज्यादा था परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे। अपने सभी रिश्तेदारों को संदेश भेजा कि यथासंभव सहयोग करें,, किसी ने संदेश का उत्तर भी नहीं दिया,, एक रिश्तेदार ने हद ही कर दी बदतमीजी भरा उत्तर देकर।
रात का सन्नाटा टूट गया, सुमित्रा रो रही थीं। राहुल और प्रिया आँखों में आँसू लिए पिता के बिस्तर के पास खड़े थे। उस पल कोई झगड़ा नहीं था, कोई मतभेद नहीं था। सिर्फ एक बात थी पापा को बचाना है।
सुबह होते-होते पूरा परिवार एक हो गया। सुमित्रा ने अपनी सोने की चेन और झुमके बेच दिए। राहुल ने अपनी स्कूटर की किश्त रोककर जमा पैसे निकाल लिए। प्रिया ने अपनी जन्मदिन की बचत और स्कूल की बचत के पैसे भी निकाल दिए। पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने कोई भी मदद नहीं की लेकिन सबसे बड़ी ताकत परिवार की एकजुटता थी।
ऑपरेशन सफल रहा श्रीकांत साहब धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे। अस्पताल के कमरे में जब वे आँखें खोलकर सबको देख रहे थे, तब सुमित्रा ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब मतभेद की कोई बात नहीं हम सब एक हैं। राहुल ने पिता का हाथ पकड़ते हुए कहा, “पापा, छोटी-बड़ी बातें तो हर घर में होती हैं। लेकिन जब मुसीबत आती है, तब पता चलता है कि परिवार कितना मजबूत है।”
प्रिया ने जोड़ते हुए कहा, “यही सबसे सुखी परिवार है जहाँ मतभेद तो होते हैं, लेकिन सहयोग कभी नहीं टूटता।
श्रीकांत साहब की आँखों में आँसू थे। वे बोले, सच में… घर की असली खुशी झगड़ों के न होने में नहीं, बल्कि मुसीबत में एक साथ खड़े रहने में होती है। उस दिन के बाद श्रीकांत जी के परिवार में छोटी-मोटी बातें फिर होती रहीं टीवी की आवाज़, नमक की मात्रा, पैसे का हिसाब लेकिन अब सब जानते थे कि ये मतभेद अस्थायी हैं। जब भी कोई सदस्य परेशानी में होता, पूरा परिवार उसके सहयोग के लिए एक हो जाता और यही उन्हें सबसे सुखी परिवार बनाता था। अफसोस इस बात का होता है,जिन दोस्तों और रिश्तेदारों को हर आड़े वक्त श्रीकांत जी,, सहयोग करते रहे थे,, वे सब मतलबी निकले एक रिश्तेदार जो बदतमीज़ी से उत्तर दिया था उसने श्रीकांत जी को संदेश में उल्टा नैतिकता का पाठ पढ़ाने लगा तब श्रीकांत सब्र का घूँट पीकर रह गए। दुखद बात यह कि समाज में मतलबी और छद्म प्रवृत्ति के लोगों की संख्या बढ़ रही है।






