“रोम-रोम में राम” (काव्य)

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री/लेखिका/अध्यापिका 

रिपोर्टर/उद्घोषिका, नवापारा-राजिम,

रायपुर, (छत्तीसगढ़)

 

 

           (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 ”रोम-रोम में राम”

   

                         (काव्य)

 

रोम-रोम में राम बसे, पावन जिनका नाम,  

सत्य, धर्म, नैतिकता का, होता हृदय में संचार।  

कुविचार मिटते मन से, चित्त होता शांत,  

राजा हो या रंक, सभी का होगा एक ही हाल।

 

मरने से पहले कर, आत्म-कल्याण के कार्य,  

माता कौशल्या और दशरथ, सपूत हैं महान।  

आदर्श, मर्यादा, संयम और अनूठा संस्कार,  

कर्त्तव्य-पथ पर चल, सुखों का किया त्याग।

 

आज्ञा-पालन को धर्म समझकर, काटे वनवास,  

सेवा, सद्भाव व मानवता की, चले सतत राह।  

राक्षसों के संहार हेतु, भगवन लिए अवतार,  

सृष्टि के कण-कण में व्याप्त, वही पालनहार।

 

आँखों में अलौकिक ज्योति, तेज व बलवान,  

मन-मंदिर में रखने से ही, हो जाते चारों धाम।  

आएँ शरण में जो उनकी, करते हैं उद्धार,  

शबरी के झूठे बेर चखकर, दिया प्रेम-सम्मान।

 

भक्त हनुमान के सीने में, रहते हैं सियाराम,  

“जय श्रीराम” से गूँजित, धरा व आसमान।  

रावण के अहंकार को, जला कर किया राख,  

सहृदय सुमिरन कर लें, होता शुभ शंखनाद।

 

उनकी ही धुन में रमे, सकल संत समाज,  

राम-राज्य की कल्पना को, करें अब साकार।  

चरणों में श्री हरि के, समाहित हैं ब्रह्मांड,  

सज गई अयोध्या नगरी, जगमग हुआ संसार।

 

 

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