राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
धीरे -धीरे,,
पानी बरस रहा है, धीरे-धीरे,
बादल काले छाए हैं आसमान पर,
बूँदें गिर रही हैं धरती पर,
मिट्टी गीली हो रही है,
लेकिन खेत सूखे पड़े हैं।
किसान मर रहा है, धीरे-धीरे,
धूप में पसीना बह रहा है,
बारिश में भीग रहा है,
भूख से पेट चिपक रहा है,
हड्डियाँ कमजोर पड़ रही हैं।
सुबह उठता है वह अँधेरे में,
रात को लौटता है थकान लिए,
हाथों में छाले, पीठ पर भार,
सपनों में बस एक छोटा सा घर,
जो कभी बन नहीं पाता।
नेता नैरेटिव गढ़ रहे हैं, धीरे-धीरे,
माइक पर चिल्लाते हैं बड़े-बड़े वादे,
टीवी पर चमकते हैं मुस्कुराते चेहरे,
“विकास आ रहा है,” कहते हैं वे,
“गरीबी मिट जाएगी,” धीरे धीरे,,
लेकिन सड़क पर मजदूर गिर रहा है,
अस्पताल में बेड खाली नहीं मिलते,
दवाई के पैसे नहीं होते जेब में,
बच्चे स्कूल नहीं जा पाते,
भूख से रोते हैं रात भर।
समाज फिसल रहा है, धीरे-धीरे,
न्याय की आवाज़ दब रही है,
सत्य की जगह झूठ बैठ रहा है,
अमीर और अमीर होते जा रहे हैं,
गरीब और गरीब रह जाते हैं।
सड़कों पर भीड़ बढ़ रही है,
लेकिन दिल खाली हो रहे हैं,
इंसानियत कहीं खो गई है,
सिर्फ स्वार्थ का खेल चल रहा है,
नैतिकता धूल में मिल रही है।
पानी बरस रहा है, धीरे-धीरे,
नदियाँ भर रही हैं, बाढ़ आ रही है,
घर बह रहे हैं, फसलें डूब रही हैं,
मजदूर की झोपड़ी पानी में डूबती है,
नेता हेलिकॉप्टर से देख रहे हैं।
“यह प्राकृतिक आपदा है,” कहते हैं वे,
“हम मदद पहुँचा रहे हैं,” दावा करते हैं,
लेकिन राशन नहीं पहुँचता गाँव तक,
टेंट नहीं लगते समय पर,
शवों की गिनती बढ़ती जाती है।
मजदूर मर रहा है, धीरे-धीरे,
उसकी मौत की खबर नहीं छपती,
अखबारों में सिर्फ नेताओं की तस्वीरें,
सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग हैं नैरेटिव,
असली दर्द कहीं दब जाता है।
समाज फिसल रहा है, धीरे-धीरे,
नफरत के बीज बोए जा रहे हैं,
जाति, धर्म, भाषा के नाम पर,
लोग लड़ रहे हैं आपस में,
जबकि असली दुश्मन ऊपर बैठा है।
पानी बरस रहा है, धीरे-धीरे,
धरती रो रही है, आसमान रो रहा है,
लेकिन इंसान नहीं रो रहा,
उसकी आँखें सूखी पड़ गई हैं,
संवेदना मर चुकी है कहीं।
मजदूर की हड्डियाँ मिट्टी में मिल रही हैं,
उसका खून बह रहा है नालियों में,
नेता के बंगले में पार्टी हो रही है,
शैंपेन की बोतलें खुल रही हैं,
हँसी-मजाक में वक्त कट रहा है।
समाज फिसल रहा है, धीरे-धीरे,
न्याय की तराजू झुक रही है,
सत्य की आवाज गूंज नहीं पाती,
झूठ के महल ऊँचे उठ रहे हैं,
सच की झोपड़ी ढह रही है।
पानी बरस रहा है, धीरे-धीरे,
बूँद-बूँद करके समुद्र बन रहा है,
मजदूर की पीड़ा इकट्ठी हो रही है,
एक दिन बाँध टूटेगा,
और सारा नैरेटिव बह जाएगा।
तब शायद समाज रुकेगा,
तब शायद आँखें खुलेंगी,
तब शायद मजदूर की मौत का हिसाब होगा,
तब शायद पानी थमेगा,
और धरती फिर से साँस लेगी।
लेकिन अभी तो…
पानी बरस रहा है, धीरे-धीरे,
मजदूर मर रहा है, धीरे-धीरे,
नेता नैरेटिव गढ़ रहे हैं, धीरे-धीरे,
समाज फिसल रहा है,
धीरे-धीरे…धीरे धीरे,,






