प्रो. (डॉ.) मंजू वर्मा,
(रिटायर्ड प्रोफेसर पंजाब विश्वविद्यालय)
चंडीगढ़, पंजाब
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
5 सितंबर 2026
शिक्षक दिवस विशेषांक
क्या हम शिक्षक …..आचार्य हैं…..?
आर्य समाज के संस्थापक, स्वामी दयानन्द सरस्वती ने एक बार राष्ट्र के उद्धार के लिए सूत्र बताते हुए कहा था कि “ब्रह्मचर्य का नाश होने से भारतवर्ष का नाश हुआ है और ब्रह्मचर्य का उद्धार करने से ही फिर देश का उद्धार होगा।”
मैं इस सन्दर्भ में कोई चर्चा नहीं करना चाहूँगी क्योंकि समय के साथ साथ परिस्थितियों में बदलाव आता रहता है। यदि वर्तमान में देखा जाये तो विवाह की आयु में बदलाव अपने आप आ गया है क्योंकि हमारे बच्चे अपने करिअर के प्रति बहुत संजीदा हो रहे हैं, उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए तत्पर रहते हैं। लड़कों की तरह लड़कियां भी आत्मनिर्भरता चाहती हैं। इसलिये बहुत बार विवाह में विलंब हो रहा है।
खैर विवाह की आयु सीमा को जाने दीजिए क्योंकि मेरी चर्चा का विषय एक प्रश्न है जो मैंने स्वयं से भी पूछा है और आप से भी पूछना चाहती हूँ ;
“क्या हम शिक्षक…….आचार्य हैं….?”
मेरे इस प्रश्न का प्रसंग स्वामी दयानंद सरस्वति के एक महत्वपूर्ण कथन से है जो मुझे बहुत ही अच्छा लगा है वो आप से साझा करना चाहती हूँ, इस बारे में आपकी राय अलग हो सकती है उसके लिए क्षमा चाहती हूँ। क्योंकि मैं इतिहास के विषय में एक रिटायर्ड प्रोफेसर हूँ और अध्यापन से जुड़े परिवार से हूँ। मेरे दादा और दादी माँ दोनों अंग्रेजों के जमाने में अलीपुर के सरकारी स्कूल में अध्यापक थे जिसके लिए मैं आज भी बहुत गर्व महसूस करती हूँ।
स्वामी जी के जिस प्रसंग को लेकर मेरे मन में प्रश्न आया है वो यह है………आप भी जानिए
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने जीवन के आखिरी वर्ष राजपुताना में व्यतीत किए। उक्त शब्द उन्होंने तब कहे जब वह 1881 में चित्तौड़ के प्रसिद्ध ऐतिहासिक किले में अपने शिष्यों के साथ थे। लार्ड रिपन ने चित्तौड़ में एक दरबार का आयोजन किया था जिस में सारे राजस्थान के राजा- महाराजा इकट्ठे हुए थे। इसी अवसर पर महर्षि दयानंद को भी निमंत्रित किया गया था। उस समय वह उदयपुर रियासत के अतिथि थे।
वहाँ वीर क्षत्रियों की संतानों को मांस -मदिरा, अफीम तथा विषय वासना में फंसे देख ऋषि की अंतर्वेदना आँखों में आंसू बन और जिह्वा पर यह शब्द आए।
पंडित रघुवीर सिंह जी शास्त्री वेदवाचस्पति ने जब नवम्बर 1958 में “देशोद्धार का सूत्र” नाम का आलेख आर्य नाम के समाचार पत्र में प्रकाशित करवाया तो उस लेख में स्वामी जी के विचारों का भी जिक्र किया।
स्वामी जी के विचारों में भारतीय राष्ट्र तथा समाज के उद्धार की रूपरेखा स्पष्ठ झलकती है। वे एक सिद्धहस्त चिकित्सक की तरह समाज की नाड़ी पर हाथ रख कर यह जान गए कि समाज रूपी शरीर कैसे रूढ़िवादी विचारों से जर्जर और अंधविश्वास से कलुषित है। उन्हें यह समझने में देर ना लगी कि नैतिकता का पतन ही समाज के ह्रास का कारण है। और इस का मूल रोग ब्रह्मचर्य का नाश है और ब्रह्मचर्य के उद्धार से ही देश का उद्धार हो सकता है।
राष्ट्र निर्माण के लिए संतानों के चरित्र का निर्माण भी आवश्यक है जिसके लिए उन्होंने अध्यापक को सिद्ध हस्त शिल्पी मान कर अपनी विचारधारा दी। उस युग में अध्यापन कराने वाले को आचार्य कहा जाता था जिसके बहुत से कर्तव्य होते थे। केवल भूगोल, गणित, इतिहास, विज्ञान, साहित्य और धर्मशास्त्र आदि विषयों को पढ़ाने वाले गुरु को आचार्य नहीं कहा जाता था अपितु आचार्य उसे कहते थे जो “आचारंग्राहयति” होता भाव जो आचार का ग्रहण कराए। जो शिक्षा के विषयों के साथ साथ पग पग पर अपने शिष्यों को सदाचार का क्रियात्मक प्रशिक्षण दे जो स्वंय सदाचारी हो। ऐसे आचार्यों के निर्देशन में शिक्षा के साथ साथ शिष्यों के चरित्र का निर्माण भी किया जा सकता है जो कि राष्ट्र निर्माण के लिए अति आवश्यक है।
आलेख पढ़ कर आप समझ सकते हैं कि मैंने यह प्रश्न क्यों पूछा है। राष्ट्र के विकास और हित के लिए जहाँ उच्च स्तरीय शिक्षा की आवश्यकता है वहाँ राष्ट्र निर्माण के लिए ऐसे शिक्षकों की भी आवश्यकता है जो शिक्षा के साथ साथ मानवीय मूल्यों, चरित्र निर्माण और राष्ट्र सर्वोपरि है का सन्देश भी दे सकें।







