राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
सच का साथ
(कहानी)
रवि का नाम सुनते ही ऑफिस में लोग मुस्कुरा देते थे, नहीं, ताने से नहीं हैरानी से, 2026 में जब पूरा शहर AI टूल्स, इंस्टेंट कंटेंट और “ट्रेंड फॉलो करो” के नारे में डूबा हुआ था, रवि एक छोटी सी डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी में काम करता था।
क्लाइंट्स चाहते थे वायरल रील्स, फेक एंगेजमेंट और झूठे दावे। बॉस रोज कहते
“रवि, वक्त के साथ चलो, आज सच नहीं, स्पीड और शोर बेचता है।” रवि चुपचाप अपना काम करता। वह झूठे आँकड़े नहीं दिखाता था। क्लाइंट को साफ बताता “यह रियल ट्रैफिक है, बाकी फेक है। लंबे समय में ब्रांड को नुकसान होगा।”
परिणाम? क्लाइंट्स भागने लगे। बॉस ने चेतावनी दी। फिर एक दिन कहा या तो वक्त के साथ चलो, या रास्ता छोड़ दो।” रवि ने रास्ता छोड़ दिया।दोस्त हँसते “अरे यार, 2026 में नैतिकता बेचोगे? लोग तो चमचमाती चीज़ें खरीदते हैं।”
माता-पिता चिंतित थे। रिश्तेदारों ने फोन पर कहा “वक्त के साथ नहीं चलोगे तो पीछे रह जाओगे।”
रवि ने एक छोटा सा स्टार्टअप शुरू किया—सिर्फ असली ब्रांडिंग, असली कहानियाँ, असली डेटा। कोई फेक नहीं। काम बहुत धीरे बढ़ा। कई महीने बिल मुश्किल से चुके। कभी-कभी रात को सोते हुए खुद से पूछता “क्या मैं गलत हूँ?” फिर 2027 आयेगा?
एक बड़ा स्कैंडल कई बड़ी एजेंसियों पर फेक एंगेजमेंट और झूठे मेट्रिक्स का केस चला। ब्रांड्स का विश्वास टूटा। लोग अब “रियल” ढूँढने लगे।
एक दिन एक पुराना क्लाइंट, जिसने कभी रवि को मना कर दिया था, खुद आया। उसके साथ तीन और कंपनियाँ थीं। हमने सुना है आप फेक नहीं करते। अब हमें वही चाहिए।”
रवि ने मुस्कुराकर कहा “मैंने तो कभी कुछ बदला ही नहीं था।” एक साल बाद उसकी छोटी एजेंसी शहर की सबसे भरोसेमंद एजेंसियों में गिनी जाने लगी। युवा लोग उसके पास आते और पूछते “सर, आपने वक्त के खिलाफ कैसे खड़े रहे?”
रवि बस इतना कहता -मैंने वक्त के साथ नहीं चला, सच के साथ चला। एक दिन वक्त खुद मेरे साथ चलने लगा है।
लोकप्रियता, ट्रेंड और तात्कालिक फायदे के पीछे भागना आसान है। लेकिन जो व्यक्ति सिद्धांतों और सच पर अडिग रहता है, समय आकर खुद उसके कदमों में कदम मिला लेता है।
जरूरत है सिर्फ समझ होने की,, कवि ने कहा है कि, कल से सो आज कर,, आज करे, सो अब,,,
पल में प्रलय होएगा,, बहुरी करेगा कब?






