राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
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मेरा होना संभावना है अब भी।
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मेरा होना संभावना है अब भी
क्या-कुछ होना था, क्या कुछ हुआ
बहुत ही कमजोर है गणित नागरिकों का
सुबह से करते हैं शुरू हो जाती है रात
फिर रात के अंधेरे में सिर्फ़ अंधेरा ही
और अंधेरे में तमाम घने संदर्भ अंधेरे के
बढ़ते ही जाते हैं और बार-बार हर कहीं
जो होना नहीं था, हो रहा है वह और वही
मुझे भी होना था कुछ, हुआ नहीं
जारी हैं उत्पात और उपद्रव जारी हैं ढ़ेरों
इधर-उधर उछलकूद कर रहे हैं बंदर
मुझे कुछ बोलना था उछलकूद-विरूद्ध
मैं देखता रहा, मैं देखता रहता हूॅं तमाशा
और शामिल भी हो रहता हूँ कभी-कभी
मुझे कुछ होना था, कुछ खोना था खूद को
बचना नहीं, कुछ रचना था जैसेकि हवन
एक कँकर तो फेंकना ही था ठहरे जल में
मुश्किल हुआ कितना एक कँकर उठाना
बहुत ही कमजोर है गणित नागरिकों का
मेरा होना संभावना है अब भी।
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क्राँतिकारी तलाश रहे हैं कंबल।
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तोप-तलवारें तनी हैं सामने
बच्चों से छीनी जा रही हैं पाठशालाएँ
ढ़ेरों घृणाएँ चिपकाई जा रही हैं पुस्तकों में
फैसले हैं कि बस थमते जाते हैं फसलों के
फिसलपट्टी पर चढ़-उतर रहे हैं अखबार
भाषा ने तय करली है हुक्केदारी की लय
हाँ और ना के बीच झूल रहे हैं चमत्कार
जैसे कि हर दूसरे पर इल्जाम है चोरी का
ठगी में लिप्त मिलता है हर तीसरा
हर चौथे पर शक़ है सरकारी-जासूस का
वर्तुल ही वर्तुल हैं जीवन की राह में
अंधेरे में काल की काली बिल्ली के पाँव
धीरे से यहीं-कहीं, आते-जाते देखता हूँ मैं
पता नहीं क्या वक्त हुआ है घड़ी में
घंटाघर में दिन हैं फिर हड़ताल के पूर्ववत
और सकुशल गुजर रही हैं शोभायात्राऍं
क्राँतिकारी तलाश रहे हैं कंबल।
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