प्रो. (डॉ.) मंजू वर्मा
रिटायर्ड प्रोफेसर पंजाब विश्वविद्यालय
चंडीगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
कविता
एक खत
बरसों पहले का
लिखा एक खत
मिला जब
दादी की संदूक से
मुड़ा तुड़ा था
अक्षर भी धुंधले थे
दादा की लिखी
एक चिठ्ठी
प्यारी दादी के नाम
बिना किसी
निजता के डर
और गोपनीयता के
रख रखाव के
साधारण से
पोस्ट कार्ड पर
बहुत से शब्दों में
लिखे थे जज्बात
अपने से दूर
मायके में बैठी
अपनी प्राण प्रिय से
खैरियत जानने के लिए
वो सब लिखा
जो लिखना था
वो सब पूछा
जो पूछना था
घर के हर सदस्य का
नाम लिखा था
बंटी, बबली, रामू और शामू
नहीं लिखा था
फूल कुमारी…प्राण प्यारी
इंतजार में तेरी…
थक गयीं मेरी
अखियां प्यारी
फिर भी लज्जा और
मर्यादा में, बहुत लिखा था
पढ़- पढ़ चिट्ठी
छलके भाव
वियोगिनी के
सजल हुए
दादी के नैना
भीगे नेत्र
टपका नीर
धुले चिट्ठी के
कुछ लफ्जों ने
खोल दिया था
हाल-ए-दिल का
राज सारा
जज्बतों में
बह कर दादी ने
उड़ेल दिया था
विरह का प्याला…..
यह कविता मेरे काव्य संग्रह “हाशिये पर जिन्दगी” में संकलित की गई है।







