कवि- अशोक कुमार यादव
मुंगेली, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
गोसइनीन गियाँ के परछो
मोर गोसइनीन गियाँ ह,
आज मइके जाहूँ कहिथे।
नइ भेजँव कहिथंव त,
मुँह-कान ल फूलोए रहिथे।।
ओहा का करथे कहिके,
ओखर लेवत हवँव परछो।
तीजा तिहार ल मनाए बर,
ओला भेज दुहूँ परसो।।
मुँह ल मुरेर-मुरेर के,
थारी-लोटा मन ल पटकत हे।
आभा-ताना मार-मार के,
एती-ओती मटकत हे।।
झगरा करत हे खुरखेद,
बात के खोदी निकाल के।
रोवत हवय कुरिया म,
जिनिस मन ल पसार के।।
बोलत नइहे मोर मेर,
कलेचुप भात-साग ल रांधथे।
गोबर-खरसी निकाल के,
गाय-गरुवा मन ल बाँधथे।।
लइका ल चेचकारत हे,
तोर ददा के बाढ़े हे फाल।
नइ जावव तुमन ममागाँव,
घर म रइहव ए साल।।
मोला खाए ल नइ देवत हे,
हेर के मँय ह खाए हँव।
चल झटकुन तियार हो कहिके,
ओला मनाए हँव।।
अतका कहेंव त, ओखर खुशी
के नइहे ठिकाना।
कहिथे- तोर सही जोड़ीदार
हर जनम म हे पाना।।
जोर डरिस लुगरा मन ल,
होगे ओहा जल्दी तियार।
आजे छोड़े ल जावत हँव,
अपन सुवारी ल ससुरार।।







