‘परिवर्तक’
:राजेंद्र रंजन गायकवाड़, जेल-अधीक्षक की आत्मकथा’
समीक्षा :डॉ. राम निवास साहू
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
‘परिवर्तक’ को केवल एक अधिकारी के सेवाकालीन संस्मरण के रूप में पढ़ना इसके आशय को सीमित करना होगा। यह कृति जेल जैसी बंद और अनुशासित संस्था के भीतर मनुष्य, अपराध और सुधार के संबंधों को देखने का प्रयास करती है। लेखक का प्रत्यक्ष अनुभव इसकी शक्ति है, किंतु यही अनुभव उसकी दृष्टि की सीमा भी निर्धारित करता है।
आत्मकथा का केंद्र लेखक का अपना जीवन और प्रशासनिक अनुभव है। इस कारण घटनाएँ एक ऐसे व्यक्ति की दृष्टि से सामने आती हैं जो स्वयं व्यवस्था का हिस्सा रहा है। इससे विवरण में प्रत्यक्षता और विश्वसनीयता आती है, लेकिन जेल-व्यवस्था की आलोचना करते समय दृष्टिकोण स्वाभाविक रूप से संस्थागत भी हो जाता है। बंदियों का संसार जिस तरह लेखक की दृष्टि से दिखाई देता है, उसमें उनकी अपनी आवाज कितनी स्वतंत्रता से उभरती है यह प्रश्न पाठक के सामने बना रहता है।
‘परिवर्तक’ का केंद्रीय विचार ‘सुधार’ है। लेखक जेल को प्रतिशोधात्मक दंड के बजाय परिवर्तन और पुनर्वास के अवसर के रूप में देखने का प्रयत्न करता है । यह दृष्टि मानवीय और आवश्यक है, परंतु सुधार की प्रक्रिया को केवल व्यक्ति के परिवर्तन तक सीमित नहीं किया जा सकता। अपराध के पीछे काम करने वाली गरीबी, सामाजिक असमानता, पारिवारिक विघटन, शिक्षा का अभाव और संस्थागत परिस्थितियाँ भी उतनी ही गंभीरता से विचारणीय हैं। इस संदर्भ में कृति के सुधारवादी आग्रह को व्यापक सामाजिक संरचना के प्रश्नों से जोड़कर पढ़ना अधिक उपयोगी होगा।
कृति की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि जेल को वह केवल अपराधियों के बंदीगृह के रूप में नहीं देखती। जेलकर्मियों और प्रशासन की अपनी जटिलताएँ हैं। अनुशासन और संवेदना के बीच संतुलन, अधिकार और कर्तव्य का तनाव तथा व्यवस्था के भी तनाव तथा व्यवस्था के भीतर मानवीय हस्तक्षेप की गुंजाइश ये प्रश्न आत्मकथा को घटनावर्णन से ऊपर उठाते हैं।
आत्मकथात्मक लेखन की एक अंतर्निहित समस्या यहाँ भी दिखाई देती है मैं’ के अनुभव से ‘व्यवस्था’ का निष्कर्ष निकालने का दायित्व। लेखक के अनुभव महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन वे जेल-व्यवस्था का संपूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। किसी अधिकारी की दृष्टि से दिखाई देने वाला जेल-जगत और किसी बंदी के अनुभव का जेल-जगत अलग हो सकता है। इस अंतर को आलोचनात्मक रूप से ध्यान में रखना कृति को अधिक गहराई से समझने में सहायक है।
भाषा और प्रस्तुति की दृष्टि से भी कृति का मूल्य उसकी सहज अनुभवपरकता में है। यहाँ साहित्यिक अलंकरण की अपेक्षा जीवन से निकले प्रसंगों का महत्त्व अधिक है। लेकिन आत्मकथा की साहित्यिक सफलता केवल घटनाओं की रोचकता में नहीं, बल्कि उन घटनाओं से पैदा होने वाले प्रश्नों और अंतर्दृष्टियों में निहित होती है। इस कसौटी पर ‘परिवर्तक’ को एक ऐसे प्रयास के रूप में देखा जा सकता है जो जेल की प्रचलित छवि के भीतर सुधार की संभावना तलाशता है, भले ही उस संभावना के सामाजिक और संरचनात्मक आयामों पर और गहराई से विचार की गुंजाइश बनी रहती है।
अंततः ‘परिवर्तक’ का महत्त्व इस बात में है कि यह अपराध और अपराधी, दंड और सुधार तथा व्यवस्था और मनुष्य के बीच संबंधों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि जेल को एक निर्जीव संस्थान के बजाय मानवीय संघर्षों से भरी जगह के रूप में देखना है; और इसकी आलोचनात्मक सीमा यह कि संस्थान के भीतर से कही गई कहानी में संस्थान से बाहर के प्रश्न अपेक्षाकृत कम दिखाई पड़ सकते हैं।
इस अर्थ में ‘परिवर्तक’ को न तो केवल एक अधिकारी की आत्मप्रशंसा के रूप में पढ़ना उचित होगा, न ही जेल-सुधार का अंतिम प्रतिपादन मानना। यह अनुभव से निकली एक ऐसी मनुष्य के बीच संबंधों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि जेल को एक निर्जीव संस्थान के बजाय मानवीय संघर्षों से भरी जगह के रूप में देखना है; और इसकी आलोचनात्मक सीमा यह कि संस्थान के भीतर से कही गई कहानी में संस्थान से बाहर के प्रश्न अपेक्षाकृत कम दिखाई पड़ सकते हैं।
इस अर्थ में ‘परिवर्तक’ को न तो केवल एक अधिकारी की आत्मप्रशंसा के रूप में पढ़ना उचित होगा, न ही जेल-सुधार का अंतिम प्रतिपादन मानना। यह अनुभव से निकली एक ऐसी आवाज है जो जेल की दीवारों के भीतर परिवर्तन की संभावना तलाशती है और पाठक को यह सोचने के लिए छोड़ देती है कि क्या केवल व्यक्ति को बदलना पर्याप्त है, या परिवर्तन की जरूरत उस व्यवस्था को भी है जो उसे दंडित करती है?
किताब ऑनलाइन फ्लिपकार्ट अमेजन पर उपलब्ध है।
ISBN 978- 93- 5823 -688 -0
₹300/-:2024:BOOKS CLINIC, BILASPUR – 495001
अति आभार आदरणीय श्री डॉ. रामनिवास साहूजी







