डॉ. वंदना श्रीवास्तव
नोएडा, उत्तरप्रदेश
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मां…..
मां सच सच कहना,
कब सीखा तुमने सबके बीच अकेले रहना ..!
बोलो ना….
क्यों पहना तुमने लाल जोड़ा,
क्यों तुमने अपना घर छोड़ा
क्या तुमको कभी भी याद नहीं आई,
मां पापा के बगैर तुम कैसे रह पाईं..?
कैसी ये रीति जबरन थोपी तुम पर,
क्यों छोड़ दिया आखिर तुमने अपना घर,
मां सच सच कहना,
कब सीखा तुमने छुपाना आँसुओं का बहना ..!
सुनो ना……
चांद सितारों की करती थी बातें,
परी कथाओं से सुनहरी की रातें,
बसा दिया खुशियों का संसार,
खुशहाल सुंदर प्यार भरा परिवार
लेकिन अपनी खुशियां कहां छुपाई,
क्या मन में था कभी क्यों नहीं जताई,
मां सच सच कहना,
कब सीखा तुमने ऐसे मुस्कुरा कर सब सहना ..!
कहो ना ……
छूटे पीछे जो चावल के दाने,
छूट गए संग सखी सहेली खेल खिलौने,
उजड़ा पौधा क्या कभी जमता है,
आंगन में खिलता है जो वो ममता है,
ढूंढ रही हो अपना बचपन नन्हे हाथों में,
ढूंढ रही हो प्यार चूमती समेटती बाहों में,
मां सच सच कहना,
कब सीखा तुमने सब सुनना कुछ भी ना कहना..!
मां सच सच कहना …..
मां सच सच कहना ……..







