राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
शिकवा!
किसी से क्या शिकवा करें,
दिल ही दिल में घुलते हैं हम।
न जाने किसकी राह देखते,
हर राहों में उलझते हैं हम।
आँसू भी अब थक गए हैं,
रोने का भी हक़ नहीं हमें
दर्द को अपने छुपा रखा है,
चुपके-चुपके सहते हैं हम।
काश ! कोई समझ लेता,
दिल की ये खमोशी
पर यहाँ तो हर कोई,
अपने ही धोखे में हैं।
शिकवा-ए-दुनिया छोड़कर,
अब तो खुद से बात करें
खुद ही अपना जख्म सी लें,
खुद ही मरहम होते हैं हम।
ये गजल भी अधूरी सी,
जैसे अधूरे अरमान
किसी से क्या शिकवा करें,
खुद ही खुद को ढूँढते हैं हम।







