संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
उड़ने से पहले जय श्री राम !
जब मनुष्य ने पहली बार चिड़िया को आसमान में तैरते देखा होगा, तो उसके मन में एक पवित्र इच्छा जागी होगी कि काश वह भी बादलों के पार जाकर दुनिया को किसी भगवान की तरह ऊपर से देख सके। इसी दिव्य स्वप्न का साकार रूप ‘विमान’ बना और इस आधुनिक रथ के सारथी बने ‘पायलट’। कभी सफ़ेद कड़कदार वर्दी, आँखों पर स्टाइलिश एविएटर चश्मा और चेहरे पर अटूट गंभीरता धारण किए ये पायलट आम इंसानों के लिए किसी दूसरे ग्रह के प्राणी हुआ करते थे। यात्रियों को लगता था कि कॉकपिट के उस पार कोई महामानव बैठा है, जो अत्यंत सूक्ष्म गणनाओं, भौतिकी के जटिल नियमों और अनुशासन की पराकाष्ठा के बल पर इस कई सौ टन वजनी लोहे के परिंदे को हवा में साधे हुए है। लेकिन अफ़सोस, हालिया घटनाओं ने इस आदरणीय मुगालते की धज्जियाँ उड़ाकर रख दी हैं। आज के कॉकपिट का नज़ारा देखकर यही लगता है कि आदरणीय पायलट महोदय अब किसी अंतर्राष्ट्रीय एयरलाइन का बोइंग या एयरबस नहीं, बल्कि अपने पुश्तैनी गाँव का खटारा ऑटो-रिक्शा या हाईवे पर लहराती कोई बेकाबू मिनी बस चला रहे हैं, जिसमें न हॉर्न की परवाह है और न ही स्टेयरिंग की।
नागरिक उड्डयन की दुनिया में आजकल जो रंग-बिरंगे कारनामे हो रहे हैं, उनसे तो यही प्रतीत होता है कि एयरलाइंस वाले अब भर्ती परीक्षा के बजाय किसी नुक्कड़ वाले ढाबे से ड्राइवरों को सीधे उठाकर कॉकपिट में बिठा रहे हैं। अभी पिछले ही दिनों दुबई से तेल अवीव जा रही एक फ्लाइट में जो आकाशीय ड्रामा रचा गया, वह किसी भी तगड़ी बॉलीवुड मसाला फिल्म की स्क्रिप्ट को मात दे सकता है। बीच हवा में, धरती से छत्तीस हजार फीट की ऊँचाई पर, जहाँ आम इंसान ऑक्सीजन की कमी और थ्रोम्बोसिस के डर से सहमा रहता है, वहाँ हमारे को-पायलट महोदय को अपने मुख्य पायलट पर ऐसा अखंड प्रेम उमड़ा कि उन्होंने जेब से धारदार चाकू निकाला और कैप्टन पर ही हमला बोल दिया। कॉकपिट का दरवाजा क्या था, मानो किसी देहाती नुक्कड़ का चौपाल हो जहाँ ‘तूने मुझे घूरकर कैसे देखा’ पर लाठी-कट्टे चल जाते हैं। गनीमत यह रही कि यात्रियों में दो सज्जन ऐसे किस्मत वाले निकल आए जो इत्तेफ़ाक से पायलट निकले और उन्होंने इस खूनी कॉकपिट के बीच पहुँचकर विमान को सही-सलामत जमीन पर उतारा। अब जरा सोचिए, कल को अगर दोनों पायलट आपस में तलवारबाज़ी करने लगें और यात्रियों में से कोई डॉक्टर, वकील या हलवाई ही निकल आए, तो क्या वह जलेबी छानने वाले चिमटे से विमान लैंड कराएगा?
कॉकपिट में केवल मलखंब और कुश्ती ही नहीं हो रही, बल्कि वहाँ भक्ति और मुक्ति के अन्य रसों की गंगा भी अनवरत बह रही है। एयर इंडिया के एक सूरमा पायलट ज्यूरिख में उड़ान भरने पहुँचे, लेकिन वे इतने ‘उच्च विचारों’ और उच्च तरंगों से भरे हुए थे कि सुरक्षाकर्मियों को उन्हें नीचे उतारना पड़ा। वजह सीधी सी थी कि महोदय दारू के समंदर में आकंठ डूबकर कॉकपिट को अपना निजी मयखाना समझ बैठे थे। उन्हें शायद लगा होगा कि जब सड़क पर गाड़ी ‘पीकर’ चलाने में अलग ही किक आती है, तो फिर बादलों के ऊपर सातवें आसमान में चार पैग मारकर उड़ान भरने का आनंद ही कुछ और होगा।
इसी लड़ी में एयर इंडिया एक्सप्रेस का एक और चमत्कार फुकेट से नई दिल्ली आते हुए देखने को मिला। विमान हवा में किसी पियक्कड़ कौवे की तरह हिचकोले खा रहा था। नीचे बैठे यात्री हनुमान चालीसा का सस्वर पाठ कर रहे थे, और अंदर हमारे मुख्य कप्तान साहब मैरिजुआना यानी गांजे की पावन पुड़िया का आनंद लेकर मोक्ष की प्राप्ति कर रहे थे। गांजे का कश खींचकर कॉकपिट में बैठे कप्तान को भला नीचे की नश्वर दुनिया और उसमें बैठे दो-चार सौ फालतू यात्रियों की चिंता क्यों होने लगी? उनके लिए तो पूरी दुनिया ही उस वक्त ‘ऑटो-पायलट’ मोड में ब्रह्मलीन हो चुकी थी।
वैसे ऑटो-पायलट की बात चले और बाल्टिक एयरलाइंस के A320 विमान का जिक्र न हो, तो यह व्यंग्य अधूरा ही रह जाएगा। एक उड़ान के दौरान दोनों पायलटों को अचानक इतना अगाध और निश्छल आलस्य चढ़ा कि वे पूरे अट्ठाईस मिनट तक खर्राटे मारकर सो गए। विमान हवा में अनाथ बच्चों की तरह भटकता रहा, नीचे एटीसी वाले पसीने से तर-बतर होकर रेडियो पर चिल्लाते रहे, लेकिन हमारे कुंभकर्ण के वंशज कॉकपिट में मीठे सपनों की तान खींचे हुए थे। वे शायद यात्रियों को यह गूढ़ आध्यात्मिक संदेश देना चाहते थे कि जब सब कुछ ईश्वर की मर्जी से ही होना है, तो फिर फालतू में जागकर इस विशालकाय डिब्बे को उड़ाने का कष्ट क्यों उठाया जाए?
आजकल का सिविल एविएशन देखकर तो सचमुच यही लगता है कि अगर आप हवाई जहाज की टिकट खरीद रहे हैं, तो आप केवल किराए का भुगतान नहीं कर रहे, बल्कि अपनी जीवन बीमा पॉलिसी की अंतिम परीक्षा दे रहे हैं। पहले कहा जाता था कि यात्रा में भगवान पर भरोसा रखो, लेकिन अब एयरलाइंस वालों ने इस कथन को पूरी तरह व्यावहारिक बना दिया है। कॉकपिट के बाहर लिखा होना चाहिए—”सवारी अपने सामान और अपनी जान की स्वयं जिम्मेदार है।”
जिस प्रकार ऑटो वाला चौराहे पर कट मारकर दूसरे ऑटो वाले को माँ-बहन की गालियाँ देता है, या बस ड्राइवर सामने वाले का शीशा तोड़ने पर आमादा हो जाता है, ठीक वही महान परंपरा अब हमारी अंतर्राष्ट्रीय एयरलाइंस के पायलट भाई निभा रहे हैं। एक जमाना था जब कॉकपिट से एनाउंसमेंट होती थी—”लेडीज एंड जेंटलमैन, दिस इज योर कैप्टन स्पीकिंग, वी आर फ्लाइंग एट थर्टी फाइव थाउजेंड फीट।” लेकिन जिस रफ़्तार से ये कारनामे बढ़ रहे हैं, वह दिन दूर नहीं जब माइक ऑन होते ही यात्रियों को यह सुमधुर संदेश सुनाई देगा—“हाँ भाई यात्रियों! मैं तुम्हारा ड्राइवर बोल रहा हूँ। पीछे कॉकपिट में मेरी और को-पायलट की बन नहीं रही है, तो हम लोग जरा दो-दो हाथ करने जा रहे हैं। गांजे की चिलम बुझ न जाए इसलिए खिड़की मत खोलना। विमान फिलहाल राम भरोसे चल रहा है, अगर रास्ते में कोई संकट आए तो दाहिनी तरफ रखे पैराशूट खुद बाँध लेना, बाकी ऊपर वाला सब देख रहा है!”
ऐसे में आम यात्री अब उड़ान भरने से पहले अपनी वसीयत लिखने और अपने कुलदेवता का स्मरण करने को ही अपनी सबसे बड़ी योग्यता मानने लगा है। सुरक्षा जांच में अब मेटल डिटेक्टर और लगेज स्कैनर से ज्यादा जरूरी यह जांचना हो गया है कि पायलट महोदय ने सुबह-सुबह कोई अवैध पदार्थ तो नहीं फूँका है या वे अपनी जेब में कोई रामपुरी चाकू छुपाकर तो नहीं ला रहे। वाकई, धन्य है हमारी उड्डयन प्रणाली और धन्य हैं हमारे ये जाबांज पायलट, जिन्होंने यात्रियों को बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के ‘एडवेंचर स्पोर्ट्स’ का ऐसा रोंगटे खड़े कर देने वाला अहसास दिला दिया है कि इंसान नीचे उतरकर सबसे पहले धरती माँ को चूमता है और कहता है
—”हे प्रभु, आज फिर बचा लिया!”







