राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
नाम !
(कविता)
जो कदमों की थरथराहट से डर जाते हैं,
वो किनारे पर ही बैठ कर रह जाते हैं।
मंजिल की चाह में जो ख़ौफ़ से घिरे रहे,
वो बहती लहरों के खारेपन में बह जाते हैं।
जिंदगी अखाड़ा है, यहाँ रुकना गुनाह है,
डर के साए में जीना, बस एक कराह है।
जीत हाथ बाँध कर बैठने वालों की नहीं,
यह तो साहस की एक खुली पनाह है।
जो अपनी ही परछाईं से सहम जाते हैं,
वो तो जीवन भर खाली हाथ रह जाते हैं।
वक़्त का पहिया उन्हें कुछ नहीं देता है,
जो बिना लड़े ही घुटनों पर ढह जाते हैं।
जो आँखों में लेकर अटूट विश्वास चलते हैं,
उनके कदमों तले जलते अंगारे भी पलते हैं।
जिन्हें खुद की काबिलियत पर होता है भरोसा,
उनके आगे मुकद्दर के फैसले भी बदलते हैं।
तू उठा कदम, अपने हौसलों को जरा आजमा,
तेरे भीतर छुपा है एक पूरा का पूरा आसमाँ।
जो खुद पर यकीन रखे, ये दुनिया उसकी है,
झुक जाता है उसके आगे फिर सारा जहाँ।
डर को छोड़, तू आत्म-विश्वास का दामन थाम,
मिलेगा तुझे ही इस जिंदगी का हर इनाम।
ये जिंदगी डरने वालों को कुछ नहीं देती,
खुद पे भरोसा रखने वालों देती है एक नाम।







