राजकुमार कुम्भज जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
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आत्मकथ्य; उर्फ मैं एक अकिंचन कवि लिखूँगा ही क्या?
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सुटेट-बुटेट राजनीतिक गिरोह से घिरा मैं एक अकिंचन कवि, सिवाय हँसी का पात्र बनने के, आखिर लिखूँगा ही क्या?अर्थात् जो कर्म-कांड सर्कस में जोकर की हिस्सेदारी है और कि जिसे वह अपने मालिक द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार सहित अपनी मौलिक जिम्मेदारी भी स्वीकार करता है, क्या बस इतना ही और सिर्फ यही ठहरा है अब मेरा भी दैनिक क्रियाकलाप ?
जो और जैसा गहन चिंतन जयशंकर प्रसाद ने किया, वह और वैसा चिंतन मेरे पास कहाँ है? जो काव्य-श्रेष्ठता सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के पास है, वह और वैसी काव्य-श्रेष्ठता मेरे पास कहाँ है? जो और जैसा शब्दों का सूक्ष्म ज्ञान-वैभव सुमित्रानंदन पंत के पास है, वह और वैसा शब्दों का सूक्ष्म ज्ञान-वैभव मेरे पास कहाँ है? अभी तो इन कवि-चिंतकों को पढ़ने-समझने की वह जरूरी तमीज भी मैं हासिल नहीं कर पाया हूँ। तब फिर कुछ लिख देने का दंभ कैसा और क्यों?
गजानन माधव मुक्तिबोध की तत्कालीन फैंटेसी को समग्रता में समझने की औकात मुझमें अभी भी विकसित नहीं हुई नहीं है। मुक्तबोध का आत्म-संघर्ष और आत्म-ताप अद्वितीय है। वे अपनी कविताओं में जितना बताते हैं, उससे कई गुना बचाते हैं। उनके इस बताने और बचाने के बीच जो अतिरिक्त अ-अभिव्यक्त है, उसे समझने का दृष्टिकोण आकस्मिकतौर पर सुलझाना अभी शेष है। सत्ताओं और व्यवस्थाओं के छद्म पारितोषिक किसी भी किस्म के प्रतिरोध को भ्रमित कर देने में अस्वीकार्य हस्तक्षेप करते हैं।
सत्ताएँ और व्यवस्थाऍं नितांत अनावश्यकतौर तक खुशहाल हैं। असमानता पीड़ित नागरिक, जीएँ-मरें इस सबसे राज्य को कहाँ कोई मतलब रह गया है? बाढ़ से, अकाल से, पानी के अभाव से, रोग-ग्रस्तता से आम लोगों का मरते जाना सभी जानते हैं कि कितना आम होता जा रहा है। महँगाई, बेरोजगारी, नशाखोरी, गुंडागर्दी, स्त्री-उत्पीड़न लालफीताशाही, रिश्वतखोरी और नाफरमानी का आलम क्या किसी से छुपा है?
इन स्थितियों-परिस्थितियों में मुझ जैसे अकिंचन कवि की हाजिरी, सिर्फ हाजिरी बजाने तक सँकुचित करदी गई है। किसी को कोई फर्क नहीं है। किसी को कोई शिकायत नहीं है। किसी को कोई आपत्ति नहीं है। सब मजे में हैं और मजे ले रहे हैं। सब कुछ मजे से चल रहा है। जगह-जगह भोजन-भंडारे जारी हैं। पता नहीं फिर मैं ही चूतिया क्यों दुखी हो रहा हूँ? क्यों अफसोस है मुझे? क्यों शिकायत है मुझे? क्यों मैं सवाल करता रहता हूँ ? मेरे पास कुछ शब्द और सिवाय दो जोड़ी कपड़ों के अतिरिक्त उत्तेजनापूर्ण शेष है ही क्या? जो आँख से न टपके तो लहू क्या?
सूचना प्रौद्योगिकी के इस महाविस्फोटक समय में, शब्दों सहित शब्दों की मौलिकता और पवित्रता को बचाये रखने का महासंकट, सामान्यतः लगभग सभी संवेदनशील-क्षेत्रों की जिम्मेदारी तय करता है, किन्तु कविताओं की प्रासँगिक आँतरिकता के आशय और अभिप्राय सर्वथा भिन्न रहते आए हैं।
परँपरागततौर पर इतना सुनिश्चित हो जाने के बाद, कवि की जिम्मेदारी कुछ अधिक खास इसलिए ठहरती है; क्योंकि कविताओं के उपनिवेश से नयी-नयी भाषा के नये-नये शब्दों, नये-नये विचारों के नये-नये आकारों-प्रकारों और अभिव्यक्ति के नये-नये प्रयोगों से नये-नये विश्वास मिलते रहने की उम्मीदें बनती हैं।
सर्वविदित सच्चाई यही है कि नये शब्दों के नये आकारों-प्रकारों से अँकुरित होने वाली अर्थ-अन्विति से मौजूदा सत्ताएँ थरथरातीं हैं। इसीलिए यथास्थितिवादी व्यवस्था की पक्षधरता रखनेवाली शक्तियाँ, समूचे सामान्य सामाजिक वातावरण को असामान्यतौर पर अशांत व प्रदूषित करते रहते हैं।
दिलचस्प ये है कि कच्छा-बनियानधारी तमाम-तमाम घनीभूत प्रतिरोधक-शक्तियाँ अपने-अपने दड़बों में चीखती-चिल्लाती रहतीं हैं। ये भी एक संभावनाशील कर्मकांड है, जो अपने-अपने समय के हवन-कुंड में शायद बेमतलब ही होता रहता है। जीवन और कविता और मनुष्यता की पक्षधरता रखनेवाली प्रश्नावली यथावत साभार बनी रहती हैं।
खतरे भयानक हैं और खामोशियों से नहीं, बल्कि खुल्लमखुल्ला मुँह सामने, दहाड़ते हुए समस्त सुसंस्कृत-मनुष्यता के सामने, अदालती सम्मन जारी करते हुए, व्याकुल प्रश्नाकुलताभरी चुनौती लिए खड़े हैं। ख़ामोशियाँ और-और भी हैं और कई-कई हैं, जो शताब्दियों से अनसुनी रहतीं आईं हैं।
सवाल ये नहीं है कि सामने खड़े इन भयानक समकालीन खतरों से कौन बचाएगा? सवाल ये है कि इस उपलब्ध भयानकता का मुकाबला सामूहिकता से कैसे किया जा सकता है? अनेक को एक में तब्दील कर देने का महाघृणास्पद अभियान कैसे ध्वस्त किया जा सकता है?
सामाजिकता का विश्वास है कि कविताओं के पास मनुष्यता का विश्वास रहता है। ये अवधारणा व्यर्थ नहीं हो सकती है कि कविताओं में ऐसा बहुत कुछ होता है, जो अन्यत्र दुर्लभ है। वह कम नहीं, बल्कि बहुत कुछ अच्छा और अछूता है, जिसके कारण कविताओं को बाधाओं तथा प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है।
अकारण नहीं है कि व्यवस्थाएँ और सत्ताएँ अपनी गतिविधियों का संचालन अपनी मनमर्जी की तथाकथित गति से करती रहती हैं। इस संदर्भ में उनके यहाँ कोई भी दुविधा, कोई भी दुराव अथवा कोई भी दुनियादारी देखने को नहीं मिलती है। दुविधा, दुराव अथवा दुनियादारी से अभिप्राय, उस सामान्य सामाजिकता का ही है, जिसे सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय से जोड़कर देखा जा सकता है।
शायद यहीं से प्रतिबद्धता की प्रतिद्वंदिता का मुद्दा बहस के केंद्र में आ जाता है। समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि ये प्रतिबद्धता की प्रतिद्वंदिता किस ओर से, किस ओर के बीच होती रही है? वाद, विवाद, प्रतिवाद से उपजी किसी भी कोशिश की प्रतिक्रिया का अधिकतम तापमान सामान्य नहीं होकर विफलता की ओर ले जाता है, जबकि संवाद ही वह एकमात्र असल लोकतांत्रिक सच्ची वैकल्पिक व्यवस्था है, जिस की विकलता अपनाने का आग्रह सर्वोत्तम और सर्वोपरि है।
लोकतांत्रिक विकलता ही कविताओं की वह विकलता है, जिसकी वजह से कविताओं में सभी के लिए, समानांतर नहीं, बल्कि एक समान जगह होती है। एक बेहतर जीवन, एक बेहतर संसार और एक बेहतर मनुष्य बनाने की चिंता ही, कविता का बेहतर घर है। कभी-कभी कविता के इस घर में कुछेक अप्रासँगिक-प्रहसन अकारण ही अतिक्रमण करते हुए अपने अस्तित्व का हुड़दँगी शोर मचाने लगते हैं। ऐसे अनधिकृत और अप्रासँगिक हुड़दँगी शोर का अनुवाद करना संभवतः अनावश्यक स्यापा है।
मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं एक ऐसा असहमत, असहाय और असमर्थ अकिंचन कवि हूँ, जो शब्दों को रौंदे जाने के बावजूद, शब्दों के बचाव में अपना-सा अपनापन समेटते-संभालते हुए, अपना तुच्छ-सा सृजनशील तपना-झुलसना और लड़ना-मरना निरंतर जारी रखता हूँ। असहमत को शत्रु समझ लिए जाने के इस ऐतिहासिक अटपटे दौर में भी अंततः कवि और कविता की संभावनाएँ असमाप्त हैं।
अपने ताप का प्रलाप करते हुए मैं एक अकिंचन कवि हाल-फिलहाल इस सबसे कुछ और अधिक लिखूँगा ही क्या?






