सौजन्यः अवधेश प्रताप सिंह कानपुर, उत्तर प्रदेश
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
जब हमारे कुछ कथित एनालिस्ट कहते हैं कि अमरीका में तो तेल के दाम 77% तक बढ़ गए, या खाने की चीजें दोगुनी-तिगुनी महंगी हो गयी… तो फर्स्ट वर्ल्ड के 14s अपना कोलोनियल ज्ञान लेकर आ जाते हैं कि उधर की पर कैपिटा देखो, और अपनी।
लेकिन ऐसे चोमू “दूर के ढोल सुहावने” वाले होते हैं.. वरना ट्रम्प की हार का सबसे बड़ा कारण यही बना है।
किसी देश की पर कैपिटा 3 हजार हो या 30 हजार… उनकी लाइफ स्टाइल इससे तय नही होती।
अमरीका में 40-50% लोग फ़ूड स्टैम्प लेते हैं, एक तरह का “80 करोड़ वाला राशन”
उधर चंद सेंट्स तेल के दाम बढ़ने से उनकी आवाजाही रुक जाती है क्योंकि कथित बड़ी पर-कैपिटा की बेसिक नीड में ही कार है (सब कार से चलते हैं),नाकि साइकल या बाइक जो इधर की छोटी पर-कैपिटा की बेसिक नीड है।
समझ आ रहा कि सो कॉल्ड लाइफ स्टाइल… कार बनाम बाइक के अंतर को तो दर्शा 3000 बनाम 30000 दिखाई जा सकती है, लेकिन डेली जीवन यापन बिल्कुल अलग चीज होती है, जैसे तेल का खर्चा।
इस चक्कर मे यदि उनका मंथली 1000 डॉलर का राशन-पानी 1500 डॉलर हो जाये,तो वो 500 डॉलर उन्हें भारी पड़ जाते हैं।
इसी वजह से ट्रम्प 5000 डॉलर की मुफ्तखोरी का वादा भी किया था यदि उसे जिताया तो।
लेकिन हमारी फर्स्ट वर्ल्ड की 14s प्रजाति… उसे सिर्फ हवाई महल वाली 30000 पर कैपिटा जैसी बातें दिखती हैं… क्योंकि बातें खोदने पर टैक्स थोड़े लगता है? (वैसे लगाना चाहिए)
खैर… इसका दोषी ट्रम्प ही है।
क्योंकि वो ही बड़ी बातें करकर आया था।
जबकि काम उसे अपने मालिको के कहे अनुसार ही करने थे।
इसी को अमरीकी जनता ने धोखे के रूप में लिया, जो उन्हें हर बार मिलता है क्योंकि रिपब्लिकन हो या डेमोक्रेट्स… उन्होंने इन चोमुओ को ये घुट्टी पिला दी है कि ऐसे धोखे असल मे “चेक एंड बेलेंस” होते हैं, जिस वजह से हर 2 साल में इसी तरह के नतीजे वहां बदलते रहते हैं।
बस कोर काम नही बदलता जो है मालिको के आदेश.. जो कोई भी सत्ता में आये उसे करने हैं, और इस बीच अमरीकी बस हर 2 साल में अपना “अमरीकी ड्रीम” जीते रहते हैं.. अपने अपने नेता के दिखाए हिसाब से।
“इतिहास की गहराइयाँ हों या आज की राजनीति, सच को बेबाकी से कहना ही मेरी पहचान है। अगर आप भी तथ्यों और निष्पक्ष विश्लेषण के साथ जुड़ना चाहते हैं, तो इस सफर का हिस्सा बने।
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हमारे भारतीय परिवारों में अक्सर एक ऐसा जिद्दी बच्चा होता है, जो अपनी बात मनवाने की जिद पकड़ लेता है। वह कहता है कि मुझे तो यही खिलौना चाहिए। अगर मुझे यह नहीं दिया, तो मैं रोता रहूंगा, चिल्लाता रहूंगा और अपनी जिद नहीं छोड़ूंगा।कई परिवारों में ऐसे बच्चे देखने को मिल जाते हैं।
मुझे तो राहुल गांधी जी और उनकी राजनीति भी कुछ ऐसी ही लगती है। जैसे कोई जिद्दी बच्चा अपनी एक ही बात लेकर बैठ जाता है,वैसे ही राहुल गांधी जी भी अपनी एक ही तरह की राजनीति पर अड़े हुए हैं।
अब देखिए, हाल ही में इन्होंने दो कार्यक्रम किए।पहला था मॉक पार्लियामेंट और दूसरा रामलीला मैदान में इनकी रैली।
सबसे पहले मॉक-पार्लियामेंट की बात करते हैं। मॉक पार्लियामेंट या मॉक यूएनओ आमतौर पर स्कूल और कॉलेज के बच्चे करते हैं, ताकि उन्हें समझ आए कि संसद या संयुक्त राष्ट्र में कामकाज कैसे होता है।लेकिन राहुल गांधी जी की मॉक पार्लियामेंट में जो कुछ देखने को मिला,वह किसी गंभीर राजनीतिक कार्यक्रम से ज्यादा बच्चों की बचकानी हरकतों जैसा लग रहा था।लोग हंस-हंसकर परेशान हो रहे थे कि आखिर वहां ये लोग कर क्या रहे हैं?
अब बात करते हैं रामलीला मैदान में हुई रैली की।मैदान में जगह-जगह कीचड़ भरा हुआ था और वहां राहुल गांधी जी की कीचड़ वाली राजनीति भी देखने को मिली।इस रैली में आप कह रहे हैं कि हम मोदी-शाह को कहीं जाने नहीं देंगे।
अरे साहब, मोदी जी और अमित शाह जी तो खुद यही कह रहे हैं कि हम कहीं नहीं जाने वाले। जनता हमें लगातार वोट देती रहेगी और 2029 में भी हमें ही वोट देगी।हम अपनी जगह पर बने रहेंगे। यानी आप तो वही बात कह रहे हैं, जो मोदी जी और अमित शाह जी चाहते हैं।
आखिर आपकी राजनीति चल किस दिशा में रही है?
अब मैं आपको एक सच्ची बात बताता हूं। यह सब देखकर अब लोग बोर होने लगे हैं। यह राजनीति धीरे-धीरे बहुत थकाऊ होती जा रही है। आप रामलीला मैदान की तस्वीरें देख लीजिए। आधा मैदान खाली पड़ा हुआ था। इसके बावजूद अलग-अलग जगहों से कैमरे के शॉट लेकर भीड़ दिखाने की कोशिश की जा रही थी।
दावा किया जा रहा था कि वहां 10 लाख लोग आएंगे, लेकिन मुझे तो ऐसा लगता है कि वहां 20 हजार लोग भी नहीं पहुंचे थे।
अब यह सब देखकर लगता है कि राजनीति कितनी बचकानी और बोरिंग होती जा रही है।लोग इस तरह की राजनीति से परेशान हो चुके हैं।
हर समय बस एसआईआर,एसआईआर और एसआईआर। आप दिल्ली से बाहर निकलकर देखिए, देश के दूसरे हिस्सों में जाइए। बहुत से लोगों को तो यह भी नहीं पता कि एसआईआर आखिर है क्या, यह कौन-सी चीज है। लेकिन राहुल गांधी जी लगातार इसी मुद्दे को लेकर बैठे हुए हैं।
चलिए, आप इसी मुद्दे पर अपनी राजनीति करते रहिए। इसी बहाने मोदी जी और अमित शाह जी अपनी जगह पर टिके हुए हैं और आगे भी टिके रहेंगे।
आप अपनी इसी तरह की राजनीति करते रहिए। हम भी देख रहे हैं, जनता भी सब देख रही है। अब आगे क्या होता है,यह भी धीरे-धीरे सबके सामने आ ही जाएगा।
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भाजपा एक ऐसी पार्टी है, जहां पार्टी का एक प्रवक्ता या सामान्य कार्यकर्ता भी यह सोच सकता है कि एक दिन मैं पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनूंगा, विधायक बनूंगा या मुख्यमंत्री बनूंग।इसके कई उदाहरण हैं।नितिन नवीन से लेकर खुद नरेंद्र मोदी तक।
नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, तब वह पार्टी में एक सामान्य कार्यकर्ता और संगठन मंत्री थे।वह गुजरात के विधायक भी नहीं थे। पहली बार विधायक बने और सीधे मुख्यमंत्री बन गए। पहली बार सांसद बने और सीधे देश के प्रधानमंत्री बन गए। नरेंद्र मोदी से बड़ा उदाहरण भला और क्या हो सकता है?
लेकिन जब नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति में आए, तब क्या पार्टी के अंदर उनके लिए रास्ता आसान था? बिल्कुल नहीं। उस समय क्या लालकृष्ण आडवाणी की अपनी लॉबी नहीं थी? पार्टी के अंदर एक पूरी डी कंपनी थी, जिसमें बड़े-बड़े नाम शामिल थे। एक पूरा गुट था,जिसकी अपनी ताकत थी। लेकिन नरेंद्र मोदी ने उन सभी को अपने साथ समाहित कर लिया और आगे बढ़े।
आडवाणी जी की सार्वजनिक चिट्ठी आज भी मौजूद है। गोवा में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उनका नाराज होना, बैठक में नहीं जाना और उस समय पार्टी के अंदर जो कुछ हुआ था, वह सब किसी से छिपा नहीं है। लेकिन इसके बावजूद नरेंद्र मोदी के लिए पार्टी में आगे बढ़ने की संभावना बनी रही। यही भाजपा की खासियत है।
अब आप दूसरी पार्टियों में ऐसी संभावना तलाशिए। क्या अब्दुल्ला परिवार को हटाकर वहां कोई सामान्य कार्यकर्ता यह सोच सकता है कि एक दिन मैं पार्टी का बड़ा नेता बनूंगा?क्या मुफ्ती परिवार को हटाकर कोई ऐसा सोच सकता है?अखिलेश यादव की पार्टी में क्या ऐसा संभव है? उनकी पार्टी के लोग उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष कहते हैं, जबकि उनकी पार्टी एक क्षेत्रीय पार्टी है।पिछली बार अगर पांच यादवों को टिकट दिया गया, तो वे भी परिवार के ही लोग थे।
क्या ममता बनर्जी की पार्टी में कोई सामान्य कार्यकर्ता यह सोच सकता है कि एक दिन मैं पार्टी का सबसे बड़ा नेता बनूंगा? क्या स्टालिन की पार्टी में ऐसा हो सकता है? क्या शरद पवार की पार्टी में ऐसा संभव है?
यही दोनों तरह की पार्टियों के बीच का फर्क है।
भाजपा में अगर आप अच्छा काम करेंगे, मेहनत करेंगे और अपनी योग्यता साबित करेंहे, तो आपके आगे बढ़ने की संभावना है। आप पार्टी के पिछले राष्ट्रीय अध्यक्षों की सूची देख लीजिए।नितिन नवीन, जेपी नड्डा, उनसे पहले अमित शाह, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी। इन सभी नेताओं को देखिए। न कोई एक ही प्रदेश से आया है, न कोई एक ही जाति से और न ही सब एक ही क्षेत्र से आते हैं। सबकी पृष्ठभूमि अलग-अलग है। यानी पार्टी में अलग-अलग राज्यों, जातियों और क्षेत्रों के लोगों को आगे बढ़ने का मौका मिला है।
अभी अरविंद केजरीवाल को उनकी पार्टी की पोलित ब्यूरो ने एक बार फिर राष्ट्रीय संयोजक बना दिया। इसके बाद लोगों ने उनकी पुरानी नियुक्तियों की सूची निकालनी शुरू कर दी। अरविंद केजरीवाल, अरविंद केजरीवाल और अरविंद केजरीवाल। पांच बार से लगातार वही राष्ट्रीय संयोजक बन रहे हैं। और यही लोग दूसरी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र यानी पार्टी के अंदर लोकतंत्र होने की मांग करते हैं।
तो पहली बात यह है कि भाजपा में एक सामान्य कार्यकर्ता के लिए भी आगे बढ़ने की जगह मौजूद है।
दूसरी बात, मैंने पहले भी बताया कि भाजपा ने नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए कितने मौके दिए हैं। अभी तीन महीने पहले ही बंगाल में उन्हें स्टार प्रचारक किसने बनाया था? उन्हें हेलीकॉप्टर देकर चुनाव प्रचार के लिए किसने भेजा था? इतनी बड़ी-बड़ी रैलियां किसने करवाई थीं? यह सब भाजपा ने ही किया था।
अब सवाल यह है कि इस तरह की बातें सार्वजनिक रूप से क्यों सामने आ रही हैं? इसकी वजह विपक्ष की राजनीति और उसके मुद्दे हैं।
मैं आपको 2024 के लोकसभा चुनाव के समय की एक दिलचस्प बात बतात हूं। जब अरविंद केजरीवाल जेल से बाहर आए थे, तब उन्होंने दो बड़ी दिलचस्प बातें कही थीं। अरविंद केजरीवाल अपनी बातों को काफी चालाकी से रखते हैं।
उन्होंने लोगों से कहा था कि आप नरेंद्र मोदी के लिए वोट क्यों कर रहे हैं? मोदी जी तो 75 साल के हो जाएंगे, फिर भाजपा अमित शाह को प्रधानमंत्री बना देगी। यानी उन्होंने लोगों के मन में यह बात डालने की कोशिश की कि अगर भाजपा चुनाव जीतती है, तो नरेंद्र मोदी की जगह अमित शाह प्रधानमंत्री बन जाएंगे।इस बात पर भाजपा को सफाई भी देनी पड़ी थी।
इसके बाद उन्होंने दूसरी बात कही। उन्होंने कहा कि जैसे ही भाजपा चुनाव जीत जाएगी, नरेंद्र मोदी योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से हटा देंगे। उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के बीच आपस में लड़ाई चल रही है।
यानी विपक्ष लगातार भाजपा के अंदर नेतृत्व को लेकर मतभेद और खींचतान दिखाने की कोशिश करता रहा है, जबकि भाजपा में अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए नेताओं को आगे बढ़ने के मौके मिलते रहे हैं।
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