भारतीय शहरों में वायु प्रदूषण की समस्या।

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डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

 बड़वा (सिवानी) भिवानी,

 हरियाणा।

            भारतीय शहरों में वायु प्रदूषण की समस्या।

भारतीय शहरों में प्रदूषण की समस्या बेहद आम है। रिसर्च के मुताबिक भारत के करीब 60 फीसदी शहरों में हवा स्वीकार्य सीमा से भी सात गुणा ज़्यादा प्रदूषित है। भारत जैसे विकासशील राष्ट्र, जहाँ शहरीकरण जारी है, पर्याप्त परिवहन प्रबंधन, उपयुक्त सड़कें और उद्योगों के अनियोजित वितरण जैसी सेवाओं की कमी के कारण वायु प्रदूषण की बढ़ती समस्याओं से पीड़ित हैं। शहरों में भीड़भाड़ वाली सड़कें वाहनों की औसत गति को कम करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप वाहनों से होने वाला उत्सर्जन अधिक होता है, जिससे वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ता है और अनियोजित शहरीकरण, औद्योगीकरण और जनसंख्या वृद्धि के साथ मिलकर वायु प्रदूषण के स्तर को बढ़ाकर मानव स्वास्थ्य के लिए ख़तरा पैदा कर रहा है, जिससे कई स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा हो रही हैं। इसके अतिरिक्त, इन शहरी क्षेत्रों में जटिल और गहन मानवीय गतिविधियाँ प्रदूषकों के उत्सर्जन को बढ़ाकर समस्या को बढ़ा रही हैं।

दुनिया के सबसे खराब वायु प्रदूषण वाले 30 शहरों में से 21 भारत में हैं। राजधानी नई दिल्ली में दुनिया भर के राजधानी शहरों में सबसे खराब वायु गुणवत्ता है। नई दिल्ली में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5) की सांद्रता विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देशों से लगभग 10 गुना अधिक है। इन शहरों में मौजूद भारी प्रदूषण यहाँ रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है, जो इन्हें हर गुजरते दिन के साथ कहीं ज़्यादा बीमार बना रहा है। यदि जीवन प्रत्याशा के लिहाज से देखें तो भारतीय शहरों में मौजूद प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा ख़तरा है। जो हर भारतीय से उसके जीवन के औसतन 5.3 वर्ष छीन रहा है। भारतीय शहरों में वायु प्रदूषण की समस्या के बीच सम्बंध आर्थिक विकास के लिए शहरी विरासत के सतत संरक्षण और उपयोग के विचार पर टिका है। टिकाऊ प्रथाओं के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करके, शहर एक साथ वायु प्रदूषण का समाधान कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, ऐतिहासिक इमारतों का अनुकूली पुन: उपयोग नए निर्माण की आवश्यकता को कम कर सकता है, जिससे धूल और सम्बंधित वायु प्रदूषक कम हो सकते हैं। इसके अलावा, ऐतिहासिक शहरी क्षेत्रों में स्थानीय आर्थिक विकास को बढ़ावा देने से आर्थिक गतिविधियों को प्रदूषण-गहन उद्योगों से दूर पर्यटन जैसी अधिक टिकाऊ प्रथाओं की ओर स्थानांतरित किया जा सकता है।

भारत जैसे विकासशील राष्ट्र, जहाँ शहरीकरण जारी है, पर्याप्त परिवहन प्रबंधन, उपयुक्त सड़कें और उद्योगों के अनियोजित वितरण जैसी सेवाओं की कमी के कारण वायु प्रदूषण की बढ़ती समस्याओं से पीड़ित हैं। शहरों में भीड़भाड़ वाली सड़कें वाहनों की औसत गति को कम करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप वाहनों से होने वाला उत्सर्जन अधिक होता है, जिससे वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ता है और अनियोजित शहरीकरण, औद्योगीकरण और जनसंख्या वृद्धि के साथ मिलकर वायु प्रदूषण के स्तर को बढ़ाकर मानव स्वास्थ्य के लिए ख़तरा पैदा कर रहा है, जिससे कई स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा हो रही हैं। इसके अतिरिक्त, इन शहरी क्षेत्रों में जटिल और गहन मानवीय गतिविधियाँ प्रदूषकों के उत्सर्जन को बढ़ाकर समस्या को बढ़ा रही हैं। प्रदूषण और धुंध से निपटने के प्रयास अक्सर शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित होते हैं। इनकी रोकथाम के लिए सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना या उद्योगों और निर्माण स्थलों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना जैसे उपायों पर ही ध्यान केंद्रित किया जाता है।

वहीं आमतौर पर इन उपायों में ग्रामीण स्रोतों की अनदेखी कर दी जाती है। यही वज़ह है कि अपने इस अध्ययन में प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने क्षेत्रीय स्तर पर प्रयास करने का सुझाव दिया है। निजी स्वामित्व वाली ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण को प्रोत्साहित करने से मौजूदा शहरी परिदृश्य को बनाए रखते हुए, वायु प्रदूषण में योगदान देने वाले शहरी फैलाव को कम किया जा सकता है। वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सतत शहरीकरण के लिए आवश्यक नीतियाँ बनानी अत्यंत ज़रूरी है। भारतीय शहरों में छोटे व्यवसायों और कारीगरों को समर्थन देने के लिए माइक्रोक्रेडिट और ऋण जैसे वित्तीय उपकरण अधिक से अधिक मात्रा में उपलब्ध कराए जा सकते हैं, जो प्रदूषणकारी गतिविधियों से दूर जाने को प्रोत्साहित करेंगे। इसके अलावा, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों के उपयोग के लिए वित्तीय प्रोत्साहन राष्ट्रीय और नगरपालिका दोनों स्तरों पर लागू किया जा सकता है।

पर्यावरण सम्बंधी नीतियों को शहरी नियोजन को विरासत संरक्षण के साथ एकीकृत करना चाहिए, जैसा कि चीन के प्राचीन शहर पिंग याओ जैसे सफल मामलों से उजागर हुआ है। ऐसी एकीकृत नीतियों के माध्यम से शहरी फैलाव का प्रबंधन सीधे वायु प्रदूषण में कमी पर प्रभाव डाल सकता है। सामाजिक आवास या एसएमई के लिए ऐतिहासिक इमारतों के अनुकूली पुन: उपयोग को प्रोत्साहित करने से निर्माण-सम्बंधी वायु प्रदूषण को कम करने में योगदान मिल सकता है जो भारतीय शहरी केंद्रों में प्रमुख है। ऐतिहासिक शहरी क्षेत्रों के भीतर स्थानीय आर्थिक विकास का समर्थन करने के लिए वित्तीय नीतियों को आगे बढ़ाने से भारी उद्योगों पर निर्भरता कम हो सकती है और सांस्कृतिक उद्यमों और टिकाऊ पर्यटन जैसे कम प्रदूषण वाले क्षेत्रों को बढ़ावा मिल सकता है। भू-स्थानिक तकनीकों के साथ उपग्रह डेटा जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन तथा सम्बंधित स्वास्थ्य प्रभावों के स्थानिक-अस्थायी वितरण पैटर्न की निगरानी और मानचित्रण में बहुत मददगार हो सकता है। इसलिए, भारत जैसे विकासशील देशों में स्मार्ट शहरों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करते हुए, प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभावों से बचने के लिए टिकाऊ शहरी पर्यावरण के लिए उचित शहरी नियोजन और टिकाऊ उपाय किए जाने चाहिए।

राष्ट्रीय और स्थानीय स्तरों के बीच नीतिगत सामंजस्य और समन्वय यह सुनिश्चित करने के लिए महत्त्वपूर्ण है कि शहरी विरासत संरक्षण के वित्तपोषण के लिए नवीन रणनीतियों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, जिससे स्थायी विकास को बढ़ावा देकर अप्रत्यक्ष रूप से वायु गुणवत्ता प्रभावित हो। शहरी विकास के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो टिकाऊ आजीविका को बढ़ावा देने के लिए नवीन वित्तीय उपकरणों के साथ हमारी ऐतिहासिक शहरी विरासत के संरक्षण को एकीकृत करें। भारतीय शहर अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं से सीख सकते हैं और ऐसी नीतियों को अपना सकते हैं जो संरक्षण प्रयासों को आर्थिक प्रोत्साहन के साथ जोड़ते हैं। इसके अतिरिक्त एक शहरी वातावरण को बढ़ावा दिया जा सकता है जो न केवल अपने अतीत को संरक्षित करता हो बल्कि अपने नागरिकों के लिए एक स्वस्थ, कम प्रदूषित भविष्य भी सुरक्षित करता हो। चूँकि शहरी भारत विरासत के संरक्षण और सतत विकास की आवश्यकता के मध्य खड़ा है, ऐसे में नवीन वित्तपोषण तंत्र और नीतियाँ हैं अपनाना अपेक्षित है, जो इसके शहरों को सभी के लिए लचीले, समावेशी और प्रदूषण मुक्त आवासों में बदलने में सक्षम बनाएंगी।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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