राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, देहरादून)
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वे लौहार औरतें, चमार औरतें भँगने
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वे लौहार औरतें, चमार औरतें भँगने
घर से बेघर तो कुछ ज्यादा पहले ही थीं वे
बेकारी, बेगारी से अब जरा निकल रही हैं बाहर
संविधान निर्माता ने जो भी जैसा भी लिखा उधर
रोटी से कहीं ज्यादा कीमती हैं क़िताबें
वह सब मूर्तियों में नहीं, उजागर है किताबों में
उसे पढ़कर आग मूत रही हैं वे औरतें इधर
ऐसा ही कुछ लिखने में थोड़ा अतिरेक तो है
मगर भयानक अतिरिक्त से मुक्त भी है कविता
यूँ कि ये कमबख्त कौन बोला, कहाँ बोला, क्यों बोला
“नाश हो संविधान रचने वाले उस चमार का
जिसे पढ़कर आग मूत रही हैं औरतें”
महाविनाशक, महाघृणित, महादरिद्र हैं ये दोनो पँक्तियाँ
लिखने से पहले जब आईं होंगी सोच में
तो क्या इतना भी नहीं सोचा होगा लिखने वाले ने
कि जिन औरतों को पिलाया जाता रहा है
सदियों से, सदियों तक,
सदियों का मूत
फिर जिन्होंने मूत पिया सदियों-सदियों तक
अगर वे मूत नहीं मूतेंगी तो फिर मूतेंगी क्या
अभी तो मूतने लगीं हैं वे सिर्फ थोड़ा मूत ही
और शायद सीख रही हैं मूतना भी
कि ये सीखना-समझना वाकई शेष है अभी
कि मूतना है तो मूतना है कितना, कब
और कहाँ-कहाँ, किसलिए, क्यों
ये सबका सब भी अभी सीख रही हैं
वे दलित, पतित, पीड़ित औरतें
सदियों से मूत पीने के लिए अभिशप्त हैं जो
रूपम, रूपमणि, रूपाली रूपसी औरतें
जरा ठहरें और दीदे फाड़कर देखें आसपास
कि संविधान पढ़ लेने वाली वे तमाम औरतें
चार अक्षर संविधान के पढ़ने लेने के बाद
कैसे और कैसी आग मूत रही हैं अब
और भूल रही हैं सिर्फ होना-सोना-खोना
निरंतर हो रही हैं सीएम, डीएम, जज, वकील, सांसद
वे लौहार औरतें, चमार औरतें भँगनें.
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