सम्पादक भोपाल (म. प्र.): राजेन्द्र सिंह जादौन
(नया अध्याय, देहरादून)
अपने वजूद और अधिकार के लिए लड़ो, प्रिय मित्र पत्रकार?
प्रिय मित्र पत्रकार
अखबार खुलते रहेंगे, बंद होते रहेंगे। चैनल चमकते रहेंगे, फिर अंधेरे में गुम भी हो जाएंगे। मालिक बदलेंगे, चेहरे बदलेंगे, नारे बदलेंगे लेकिन अगर कुछ नहीं बदलना चाहिए, तो वह है तुम्हारा वजूद, तुम्हारा ईमान और तुम्हारी कलम की सच्चाई। क्योंकि इस देश में लोकतंत्र की असली सांस अगर कहीं चलती है, तो वह तुम्हारी कलम से ही चलती है।
आज तुम एक ऐसे दौर में खड़े हो, जहाँ पत्रकारिता पेशा कम और समझौता ज़्यादा बनती जा रही है। जिन लोगों का कभी खबरों से कोई लेना-देना नहीं था, वे आज मीडिया के मालिक बन बैठे हैं। कोई नमक बेचकर अखबार चला रहा है, कोई सीमेंट और जमीन के धंधे से चैनल खड़ा कर रहा है। इनका उद्देश्य पत्रकारिता को मजबूत करना नहीं, बल्कि अपने कारोबार को सुरक्षित करना और उसे फैलाना है। और इस पूरे खेल में तुम एक मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रहे हो।
तुम्हारी कलम, जो कभी जनता की आवाज हुआ करती थी, आज कई बार किसी के इशारों पर चलने लगती है। खबरें अब सच के आधार पर नहीं, बल्कि फायदे और नुकसान के हिसाब से तय होने लगी हैं। कौन सी खबर दिखानी है, कौन सी दबानी है, किसे बड़ा बनाना है और किसे छोटा—ये सब एक अदृश्य स्क्रिप्ट के तहत होता जा रहा है। और तुम, जो इस सिस्टम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हो, धीरे-धीरे अपनी पहचान खोते जा रहे हो।
मित्र, ये सिर्फ़ नौकरी का सवाल नहीं है। ये तुम्हारे अस्तित्व का सवाल है। अगर आज तुमने अपने अधिकार और सम्मान के लिए आवाज़ नहीं उठाई, तो कल तुम्हारे पास कुछ भी नहीं बचेगा न सम्मान, न सुरक्षा, न स्वतंत्रता। तुम्हें डराया जाएगा, दबाया जाएगा, और अगर फिर भी तुम नहीं झुकोगे, तो तुम्हें झूठे मुकदमों में फंसाया जाएगा या तुम्हारी आवाज़ को हमेशा के लिए खामोश कर दिया जाएगा।
इतिहास गवाह है कि जब-जब पत्रकारों ने सच्चाई के लिए आवाज उठाई, उन्हें कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन वही पत्रकार समाज में बदलाव के वाहक भी बने। उन्होंने सत्ता से सवाल किए, व्यवस्था को आईना दिखाया और आम आदमी की आवाज़ को ताकत दी। लेकिन आज हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि सवाल पूछना ही अपराध माना जाने लगा है।
तुम्हें यह समझना होगा कि सरकारें स्थायी नहीं होतीं, लेकिन पत्रकारिता का धर्म स्थायी होता है। सरकारें आएंगी, जाएंगी, लेकिन अगर पत्रकारिता कमजोर पड़ गई, तो लोकतंत्र सिर्फ़ एक दिखावा बनकर रह जाएगा। तुम्हारा काम किसी सरकार या व्यक्ति का समर्थन या विरोध करना नहीं है, बल्कि सच को सामने लाना है चाहे वह किसी के भी खिलाफ क्यों न हो।
आज जरूरत इस बात की है कि तुम अपने वजूद को पहचानो। यह समझो कि तुम्हारी कलम की ताकत क्या है। यह वही ताकत है, जो सत्ता को झुका सकती है, जो व्यवस्था को बदल सकती है और जो समाज को जागरूक बना सकती है। लेकिन अगर तुमने इस ताकत को किसी के हाथों में सौंप दिया, तो तुम सिर्फ़ एक कर्मचारी बनकर रह जाओगे, पत्रकार नहीं।
प्रिय मित्र, लड़ाई लड़ना जरूरी है लेकिन यह लड़ाई किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ होनी चाहिए जो पत्रकारिता को दबाने की कोशिश कर रही है। तुम्हें अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठानी होगी। सरकार से सवाल करने होंगे, अपने हक की मांग करनी होगी और यह दिखाना होगा कि पत्रकारिता कोई भीख नहीं है, यह लोकतंत्र का स्तंभ है।
जनसंपर्क का मतलब सिर्फ प्रेस रिलीज लेना और छाप देना नहीं है। इसका मतलब है जवाबदेही तय करना, सवाल पूछना और जनता के हित में सच को सामने लाना। तुम्हें यह दिखाना होगा कि अगर पत्रकार नहीं होंगे, तो सत्ता भी अपनी सीमाएं भूल जाएगी।
मित्र, डर स्वाभाविक है। हर इंसान को अपनी सुरक्षा की चिंता होती है। लेकिन अगर डर ही तुम्हारे फैसले तय करने लगे, तो फिर पत्रकारिता का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। तुम्हें तय करना होगा कि तुम एक सुरक्षित लेकिन खामोश जिंदगी जीना चाहते हो या एक संघर्षपूर्ण लेकिन सम्मानजनक जीवन।
याद रखो, तुम्हारी कलम सिर्फ स्याही से नहीं चलती, वह विश्वास से चलती है। और अगर यह विश्वास टूट गया, तो फिर कोई भी तुम्हारी लिखी बात पर भरोसा नहीं करेगा। इसलिए अपने वजूद को बचाए रखना, अपने ईमान को जिंदा रखना और अपने अधिकार के लिए लड़ते रहना बहुत जरूरी है।
क्योंकि अगर तुम नहीं लड़े, तो आने वाला समय तुम्हें माफ नहीं करेगा। आने वाली पीढ़ियां यह कहेंगी कि एक दौर था जब पत्रकार हुआ करते थे, जो सच के लिए खड़े होते थे। लेकिन फिर एक समय ऐसा आया जब उन्होंने चुप रहना सीख लियाऔर उसी दिन पत्रकारिता मर गई।
इसलिए उठो, अपनी पहचान को बचाओ, अपनी आवाज को मजबूत करो और अपने अधिकार के लिए लड़ो। क्योंकि अगर तुम जिंदा रहोगे, तभी सच भी जिंदा रहेगा।







