सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका
अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा-राजिम। [रायपुर, छ.ग.]
(नया अध्याय, देहरादून)
“स्याही सूखे न कभी”
— (कविता)
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ऐ! ज़िन्दगी क्या लिखूँ तुझ पर?
गमगीन हृदय के भावों से,
पावन कर दूँ मन का हर कोना,
स्पर्श कर सकूं हर एक रूह को।।
कुविचारों को तज कर सारे,
चिंतन की कोई नई रीत दूँ।
समर्पित होकर उकेर सकूं मैं,
दुख-तकलीफ़, जन की पीड़ा।।
शब्दों में मायूसी कभी न भरना,
खोखले रिवाजों में न समेटना।
अंतर्मन के सारे द्वंद निकलें,
चुनिंदा कुछ एहसास हमें देना।।
कोरी न रह जाएँ मेरी कल्पना,
खुशियों के बेशुमार मोती देना।
व्याकुलता मिट जाए सारी,
श्रृंगारित ऐसी कविता कर देना।।
छंद, रस, अलंकार न जानूँ,
अर्थ को तुम अनर्थ न करना।
संयम की सीमा पार न करूँ,
शील, गुण, धर्म का मार्ग देना।।
खामोशी मेरी कहती है क्या,
कागज पर सब बयां कर देना।
भावनाओं की स्याही सूखे न कभी,
प्रेम की गहराई अथाह भर देना।।
रुके न ये सृजन का सिलसिला,
सरोज-सी यूं ही सुशोभित रहूँ,
जीवन के शांत सरोवर में सदा
शब्दकोश उर में निर्मित करूं।।
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