नील मणि
कार्टूनिस्ट और साहित्यकार
मेरठ, (उत्तर प्रदेश)
(नया अध्याय, देहरादून)
कर्म बनाम भाग्य
नवंबर की गुलाबी ठंड थी। मैं और सिया पार्क में टहल रहे थे। पत्तों पर ओस की नमी थी और बातचीत का विषय जाने कैसे उस शाश्वत प्रश्न पर टिक गया— कर्म बड़ा या भाग्य?
तर्कों के तराजू में कभी कर्म का पलड़ा भारी होता, कभी भाग्य का। तभी मेरे मन में एक कहानी कौंध गई…
कहानी थी एक गाँव की—
एक अविवाहित युवती गर्भवती हो गई। पूरा गाँव, माता-पिता और रिश्तेदार उस पर टूट पड़े। सब जानना चाहते थे- उस युवक का नाम। दबाव इतना बढ़ा कि अंततः युवती ने गाँव के मंदिर में रहने वाले वृद्ध पुजारी का नाम ले लिया।
यह सुनते ही गाँव में तूफ़ान खड़ा हो गया। भीड़ गुस्से से मंदिर पहुँची। पुजारी को बुलाया और उसे अपमानित करना शुरू कर दिया। आरोप, गालियाँ, निंदा— सब उस बूढ़े पर लाद दी गईं। पुजारी मौन रहा। उसने न तो प्रतिवाद किया, न रोष प्रकट किया। केवल हाथ जोड़कर युवती को अपने आश्रम में ले गया और उसकी सेवा में लग गया।
समय बीतता गया। युवती ने एक बच्चे को जन्म दिया। पुजारी अपनी बच्ची सा प्यार, स्नेह, आर्शीवाद उस बच्ची पर लुटाता था।
धीरे-धीरे उस लड़की का अपराध-बोध जाग रहा था। उसका मन ग्लानि से भर रहा था। एक दिन वह बिलख ही पड़ी, पुजारी के चरणों में गिर पड़ी और अपना पाप स्वीकार कर लिया।
पुजारी ने न तो उसे दोषी ठहराया और न ही कोई प्रतिशोध लिया।
अपनी सरलता, धैर्य और कर्म के बल पर उसने समाज का दिल जीत लिया।
कहानी यही कहती है कि भाग्य चाहे जैसा संकट खड़ा करे, विजय अंततः कर्म की ही होती है।
पुजारी का भाग्य तो उस पर लांछन लगाकर उसे बदनाम करने का था, लेकिन उसके शांत चित्त और कर्मों ने अंततः सत्य को उजागर किया।
इसलिए निर्णय आप पर है—
क्या आप भाग्य का रोना रोएँगे, या अपने कर्म से उसे बदल देंगे?







