सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका
अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा, राजिम,
रायपुर, छत्तीसगढ़।
(नया अध्याय, देहरादून)
सन्नाटे में गूँजती दुआ! ( कविता )
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चारों ओर नफरतों की बौछारें थीं,
फिर भी प्रेम की दुनिया तिश्नगी से मरी थी।
धन-दौलत की हवस कभी छुई तक न थी,
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की लौ साँसों में धरी थी।
ऐ जिंदगी, राहें जख़्मों से सजी थीं,
पर मंज़िल की धुन में पलकें झुकी न थीं।
सफ़र का हर मोड़ वीरान-सा चीखा,
साथ बस अपनी परछाईं ही सिसकी थी।
एहसासों में भी इक सन्नाटा पसरा था,
मन ख़ामोशी से खुद को टटोल रहा था।
खुद की ही अदालत में गुनहगार बनी थी,
मानव की नियति को लहूलुहान देख रही थी।
दर्द औरों का भी रग-रग में उतर रहा था,
‘काश’ और ‘क्यों’ के काँटों पर चल रही थी।
स्वार्थ की दलदल से पाँव खींचने की जद्दोजहद थी,
पर सवाल आज भी लावारिस-से खड़े थी।
भेद-भाव की दीवारें कभी रास न आईं,
उम्मीद की शमा अब अँधेरे से लड़ी थी।
‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की तड़प साँस बनी थी,
खुदा से भी बस सबकी भलाई ही तो माँगी थी।







