अनामिका सिन्हा पाठक ‘अर्श ‘
वाराणसी, (उ. प्र.)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
‘हाँ मैंने भी की है मुहब्बत ‘
हां मैंने भी की है मुहब्बत…..
निभाई है इश्क की रवायत…।
खुद को मिटाया तो ये राज खुला…..
खुदा ही हूँ मैं….
है यही रस्में उल्फत……।
इश्क में डूबा ये दोनों जहान है….
जमीं औ आसमान है…..।
मीरा की बगावत है इश्क….
राधा की इबादत है इश्क….।
इश्क है तो हम तुम हैं…..
खुदा की इनायत है इश्क…।
खुशनसीब हैं वो जिनके दिलों में खिलते हैं मुहब्बत के फूल….
रूह को रूह से रूबरू करा दे….
ऐसा करिश्माई अहसास है इश्क…।
शुकराने में गुजर रही जिन्दगानी….
या रब है तेरी बड़ी मेहरबानी…..।
सुनो जरा, अपनी गीता, कुरान, बाइबल और गुरुग्रंथ को….
बाहर ही रख कर दाखिल होना मुहब्बत के मयखाने में…….
यहाँ दीवानों को नशा है अनंत का….. यहाँ प्रेम ही है पंडिताई की निशानी…।❤।’








