राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
रात एक बहती नदी, दिन ठहरा समंदर
इस बहर में, डूबा रहा दिल का सफर।
रात की लहरों में खो जाता है हर गम
दिन की खामोशी में छुप जाता है डगर।
बहती नदी में डूबे हुए, सारे ख्वाब देखें
ठहरे समंदर में बस एक तन्हा सा सहर।
रात कहती चलो, दूर निकल जाएँ आज
दिन देखता फुटपाथ पे कितने है पत्थर।
नदी के पाट में बहते हैं लाखों अफसाने
समंदर की गहराई में चुप है हर सफर।
रात पूछती है “कहाँ जा रहे हो “रंजन”
दिन देखता है, मेरे पैरों के छालों का असर।






