राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
(लेख)
समय के साथ धर्म की मीमांसा
बौद्ध संगीतियों की परंपरा से प्रेरणा लेते हुए मनुष्य का इतिहास धर्मों से गहरा जुड़ा रहा है। धर्म ने समाज को नैतिकता, अनुशासन और सामुदायिक एकता दी है लेकिन समय के साथ जब धर्म जड़ हो जाता है, उसके मूल संदेश को भुलाकर केवल रीति-रिवाज, सत्ता और पहचान की राजनीति हावी हो जाती है, तब वही धर्म भेदभाव, हिंसा और कट्टरता का स्रोत बन जाता है। आज हम ठीक इसी स्थिति का सामना कर रहे हैं। इसलिए समय-समय पर हर धर्म की गंभीर मीमांसा (आलोचनात्मक समीक्षा) आवश्यक है ठीक उसी तरह जैसे प्राचीन भारत में बौद्ध संगीतियाँ हुआ करती थीं।
बौद्ध संगीति की परंपरा एक प्रेरणा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद बौद्ध संघ ने कई संगीतियाँ आयोजित कीं। इनमें भिक्षु एकत्र होकर धर्म के मूल उपदेशों की शुद्धता जाँचते थे, विवादों का समाधान करते थे और समय के अनुकूल व्याख्याएँ तय करते थे। पहली संगीति राजगृह में, दूसरी वैशाली में, तीसरी पाटलिपुत्र में अशोक के काल में हुई। इन बैठकों का उद्देश्य था, धर्म को जड़ होने से बचाना और उसे जीवंत रखना। यह परंपरा सिखाती है कि कोई भी धर्म “पूर्ण और अंतिम” नहीं हो सकता, समय बदलता है, समाज बदलता है, इसलिए धर्म की समझ भी विकसित होनी चाहिए।
दुर्भाग्य से अधिकांश आधुनिक धर्मों में ऐसी खुली, संस्थागत समीक्षा की व्यवस्था लगभग समाप्त हो चुकी है जो थोड़ी बहुत चर्चा होती भी है, वह अक्सर रूढ़िवादी या सुधारवादी खेमों में बँट जाती है और वास्तविक संवाद नहीं बन पाती।
धर्म के बारे बात करना भक्त पाप समझते हैं।
वर्तमान समस्या बढ़ती धर्मांधता और मानवीय भेद आज दुनिया में धार्मिक कट्टरता कई रूपों में दिख रही है। धर्म को व्यक्तिगत आस्था से हटाकर सामूहिक पहचान और राजनीतिक हथियार बना दिया गया है। पवित्र ग्रंथों की शाब्दिक और संदर्भहीन व्याख्याएँ बढ़ रही हैं। हमारा धर्म सर्वोच्च है वाली भावना दूसरे धर्मों के प्रति घृणा पैदा कर रही है।
महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों और मुक्त चिंतकों के अधिकार अक्सर धर्म के नाम पर सीमित किए जा रहे हैं।सोशल मीडिया ने इन कट्टर विचारों को और तेज़ी से फैलाया है।
परिणामस्वरूप समाज में अविश्वास, हिंसा और मानवीय एकता का ह्रास हो रहा है। जबकि लगभग सभी प्रमुख धर्मों के मूल में करुणा, सत्य, अहिंसा और मानवता की बातें हैं। समस्या धर्म में नहीं, उसकी जड़ व्याख्या और सत्ता-संरक्षण की प्रवृत्ति में है।
मीमांसा क्यों आवश्यक है?
धर्म या आस्था को जीवित रखना बिना समीक्षा के धर्म मृत हो जाता है, वह केवल अतीत की याद बनकर रह जाता है। मानवता की रक्षा जब धर्म मनुष्य से ऊपर हो जाता है, तब मनुष्य का मूल्य गिर जाता है। मीमांसा इस संतुलन को वापस लाती है।
वैज्ञानिक और नैतिक प्रगति से तालमेल अधोसंरचना विकसित कर आधुनिक ज्ञान (विज्ञान, मनोविज्ञान, मानव अधिकार) के साथ धर्म का संवाद जरूरी है। जिससे कट्टरता की रोकथाम हो। खुली बहस कट्टर विचारों को चुनौती देती है और उन्हें कमजोर करती है लेकिन एक रास्ता भी देती है। जापान, चाइना और अन्य बुद्धिस्ट राष्ट्र समय के साथ परिवर्तन करते है। इस विषय पर मेरी आत्म कथा परिवर्तक,,जो ऑनलाइन फ्लिपकार्ट अमेजन पर उपलब्ध है,, पढ़ सकते हैं।
इस दिशा में स्थायी समीक्षा परिषदें प्रत्येक प्रमुख धर्म के भीतर स्वतंत्र, विद्वान और साधारण अनुयायियों वाली “धर्म-मीमांसा परिषदें” गठित की जाएँ। ये परिषदें हर 20–30 वर्ष में मूल सिद्धांतों, रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवहारों की समीक्षा करें। इनमें महिलाओं, युवाओं और अल्पसंख्यक विचारों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले।
अंतर-धार्मिक संवाद को संस्थागत रूप केवल प्रतीकात्मक सम्मेलन नहीं, बल्कि नियमित और गहरे संवाद मंच बनाए जाएँ जहाँ विद्वान एक-दूसरे के ग्रंथों का अध्ययन करें और साझा मानवीय मूल्यों को रेखांकित करें। ताकि इक्कीसवीं सदी में सीना उठाकर खड़े हो सकें। इसके शिक्षा में आलोचनात्मक दृष्टिकोण स्कूल और कॉलेज में धर्म की शिक्षा “आस्था” के रूप में नहीं, बल्कि “इतिहास, दर्शन और समाजशास्त्र” के रूप में दी जाए, छात्रों को धर्मों की आलोचना करने का साहस सिखाया जाए, न कि केवल अंध श्रद्धा और दिखावें की धार्मिकता। मैने देखा है कि कोई भी त्योहार आता तो नेता अपने बैनर्स / फोटो लगवा देते है,,उन्हीं के नीचे न केवल मवेशी बल्कि बिकलांग भूखे आदमी तिल -तिल मरते हैं।
ग्रंथों की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक व्याख्या हर धर्म के विद्वान अपने पवित्र ग्रंथों को उनके ऐतिहासिक संदर्भ में पढ़ें और समझाएँ शाब्दिक कट्टरता को हतोत्साहित किया जाए और आज की मानवीयता को बढ़ाया जाए,,जिसके अंतर राष्ट्रीय/ राष्ट्र मानव अधिकार आयोग काम कर रहा है। इसको जन जन सरकारें पहुँचाये।
राजनीति से धर्म का अलगाव धर्म को राजनीतिक सत्ता का औजार बनाने पर कानूनी और सामाजिक अंकुश लगे धर्म की आलोचना को “अपमान” नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार माना जाए क्योंकि समाज जिन्दा हैं तो धर्म है।
अंततः धर्म व्यक्तिगत अनुभव और आंतरिक विकास का विषय है। सामूहिक दबाव और पहचान की राजनीति को कम करके व्यक्तिगत विवेक को प्रोत्साहित किया जाए। धर्म मनुष्य के लिए है, मनुष्य धर्म के लिए नहीं। समय के साथ मीमांसा न करने से धर्म कट्टरता का जेल बन जाता है। बौद्ध संगीतियों की परंपरा हमें याद दिलाती है कि समीक्षा धर्म की शत्रु नहीं, उसकी मित्र है। अगर हम आज इस साहस को अपनाएँ, तो धर्म फिर से मानवता को जोड़ने वाला बल बन सकता है, न कि बाँटने वाला समय की माँग है कि हम आस्था के साथ विवेक को भी स्थान दें। केवल तभी धर्म मानवता की सेवा कर पाएगा।






