राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
पता नहीं क्यों!
(नज्म)
पता नहीं क्यों अब, अजनबी लगते हैं सब,
इस भरे शहर में, अंजाने से दिखते हैं सब।
भीड़ है चारों तरफ, मगर कोई पास नहीं,
चेहरों पर मुस्कान है, अंदर उदास हैं सब ।
दिलों में छुपाकर, मतलब की कोई चाहत,
न जाने क्यों, मुखौटा ओढ़कर मिलते हैं सब।
कभी जो अपने थे, आज वो भी खामोश हैं,
लोग वही हैं, बदले-बदले से लगते हैं सब।
बातें होती हैं मगर, अब वो बात नहीं रही,
वक्त की आंधियों में, बिखर गए हैं सब।
हम हैं जो, वही पुरानी सादगी ढूंढते हैं,
हर चेहरे पर छाई, खामोशी ढूंढते हैं सब।
आज दौर-ए-खामोशी का मंजर तो देखिए,
अपनी ही परछाई से, अमूमन डरते हैं सब।





