दार्शनिक सूर्य जी
बागपत, उ. प्र.
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
(W) 6395080071
हित की राह पर चलते जाना
(काव्य)
हितकारी, हितैषी बनो मनुष्यों रे!
तुम्हारी आतुरता, तुम्हारी अपनी
अधिक चिंतन से है।
बनता है एक सुंदर समाज,
जहाँ परस्पर प्रेम है,
वहीं कल्याण का है राज।
प्रेम ही तो मार्ग है,
जो सबको जोड़ देता है,
और इसी कल्याण के लिए
मनुष्य को बल देता है।
(यह गहरा और सकारात्मक संदेश देने वाली कविता दार्शनिक सूर्य जी द्वारा रचित है। आप संस्कृति के संरक्षक, समरसता के प्रतीक, आध्यात्मिक चिंतक, महनीय साहित्यकार, मानवतावादी एवं समाज-सुधारक हैं।)







