सादगी में जो गरिमा है, वह दिखावे के शोर में कहाँ?

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका

अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति

गोबरा नवापारा-राजिम। [रायपुर, छ.ग.

 

 

                   (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

आलेख:

 सादगी में जो गरिमा है, वह दिखावे के शोर में कहाँ?

  -सुश्री सरोज कंसारी

 

(संस्कार दीपक हैं। आँधी कितनी भी तेज हो, इन्हें बुझने नहीं देना चाहिए।)

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विवाह भारतीय संस्कृति का सबसे पवित्र संस्कार माना गया है। यह दो आत्माओं का मिलन है, जहाँ अग्नि को साक्षी मानकर सात जन्मों तक साथ निभाने का वचन लिया जाता है। परंतु विगत कुछ वर्षों में विवाह के इस पवित्र स्वरूप में पश्चिमी संस्कृति की चमक-दमक ने प्रवेश कर लिया है। प्री-वेडिंग फोटोशूट उसी का एक उदाहरण है, जो आज युवाओं में एक ट्रेंड बन चुका है। प्रश्न यह उठता है कि क्या यह आधुनिकता की पहचान है या हमारी सभ्यता और संस्कारों पर एक प्रहार?

 

प्री-वेडिंग फोटोशूट एक सामाजिक कुरीति के रूप में तेजी से फैल रहा है। आजकल हमारे समाज में एक नए फैशन का जन्म हुआ है। सभ्यता और संस्कृति को नकारते हुए आज की युवा पीढ़ी में अपने अनुसार चलने, करने और रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। बड़े-बुजुर्गों की बातों का उनकी नजर में कोई मोल नहीं। एक तरफ परिवार, समाज के मुखिया और माता-पिता हमारी प्राचीन सभ्यता को सहेजने के लिए प्रयासरत हैं, वहीं आज के बच्चे उनके अनुभवों का लाभ नहीं लेना चाहते। शादी-विवाह जैसे पवित्र रिश्ते का मजाक बनाने में तुले हैं।

 

नकल करने के लिए भी सूझ-बूझ की जरूरत होती है। हम किस बात की नकल कर रहे हैं, क्या वह भविष्य के लिए उपयुक्त है, उसके उद्देश्य सही हैं या गलत, इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इस पर चिंतन करना जरूरी नहीं समझते? कुछ देर की मौज-मस्ती के लिए उठाया गया कदम जीवन भर का अफसोस बन जाता है। इसके हानिकारक प्रभाव भी होते हैं। एक बार चरित्र का पतन हुआ, तो उसे सुधारने में बहुत कठिनाई आती है।

 

आज दिखावे की होड़ लगी है। एक को कुछ नया करते देखकर दूसरे उतनी ही तेजी से अनुकरण करते हैं, जितनी तेजी से किसी अच्छी बात पर अमल नहीं करते। असलियत कुछ भी हो, पर लोगों की नजर में बनावटीपन आज की युवा पीढ़ी को खोखला कर रहा है। विवाह तय होते ही मोबाइल में चैटिंग, कॉलिंग और फोटो शेयरिंग आम बात है। विवाह से पहले एक-दूसरे के बारे में सब जान जाते हैं। जो एक हद तक तो ठीक है, लेकिन अति होने पर यही विवाद का कारण बनता है।

 

रिश्तों की नींव आंतरिक अनुभूति और सच्ची भावना पर निर्भर होती है, न कि साथ घूमने और यह जताने में कि हम बहुत खुश हैं और भौतिक चीजों से भरपूर हैं। लेकिन जब किसी कारणवश विवाह टूट जाते हैं, तो सबसे ज्यादा लड़की की भावनाएँ बिखर जाती हैं।

 

विवाह सात जन्मों का बंधन है, जिसमें रीति-रिवाज और परंपरा का बहुत महत्व है। इसमें पुरानी पीढ़ी के अथक प्रयास और चिंतन हैं। संस्कार, मर्यादा और व्यवस्थित जीवनशैली के निर्माण के लिए सुखद विचारधाराएँ हैं। जीवन के हर पग पर आने वाली चुनौतियों से लड़ने की क्षमता है। अग्नि की साक्षी, हवन कुंड, सात फेरे, सामाजिक जन और विभिन्न रस्में सादगी में सरल-सहज जीवन जीने के कई विकल्प देती हैं, जिनमें बुजुर्गों और ईश्वर का आशीर्वाद है। इनके पालन से हर पल चुनौतियों से भरी जिंदगी को पार करने की कला का विकास होता है। इसलिए नियमों में बँधकर भारतीय पद्धति से विवाह को सभी को स्वीकार करना ही चाहिए।

 

आज बड़े-बुजुर्गों के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं। वे सोचते हैं, न जाने किस धारा में बह रही है आज की पीढ़ी? शर्म, लज्जा, अपनों से बड़ों का सम्मान यही तो हर व्यक्ति का गहना है। पहले विवाह का रिश्ता बड़े-बुजुर्ग तय करते थे। सब कुछ जानकारी के बाद, सही होने पर वर-वधु को दूर से ही देखते थे और पसंद-नापसंद का सवाल ही नहीं होता था। “बड़े कर रहे हैं तो सही ही होगा” ऐसी सोच होती थी और ये रिश्ते दूर तक चलते थे। प्रेम, सामंजस्य और आपसी व्यवहार का समन्वय होता था। हर फैसले में सलाह ली जाती, कहीं कोई विवाद होने पर घर के लोग साथ खड़े होते और सुलझा लेते थे।

 

आज के रिश्तों में वह मजबूती नहीं। एक मिनट भी नहीं लगता बिगड़ने में। जरा सी मनमुटाव पर मरने-मारने और छोड़ने में देर नहीं करते। कारण है बिना सोचे कार्य करना, अपनी मनमानी और जीवन के इतने अहम फैसले में बड़ों की दखल पसंद न करना।

 

पहले लड़का-लड़की बिना एक-दूसरे को देखे भी विवाह कर लेते थे। पहले से कोई संपर्क नहीं होता था, न ही फोन की सुविधा थी। दो अजनबी फिर भी जीवन के सफर में सच्चे हमसफर, हमदर्द और हमराज होते थे। हर तकलीफ को सहते-सुनते, एक-दूसरे की बात को त्याग, तपस्या और साधना मानते थे। पर कभी टूटते नहीं थे, तलाक जैसी कोई बात नहीं होती थी। पर आज टीवी सीरियल और विभिन्न सोशल मीडिया के कारण दूषित माहौल का निर्माण हुआ है, जिसमें रिश्तों को तोड़-मरोड़ कर परोसा जाता है। किसी से प्रेम, किसी से विवाह, एक के टूटने के बाद दूसरे से फिर जुड़ जाना। यही क्रम चलता रहता है जैसे प्रेम नहीं, जिंदगी एक खिलवाड़ है और लिबास की तरह लोग अपने लिए साथी बदलते रहते हैं। इससे कोई अच्छी सीख नहीं मिलती। बस शक, षड्यंत्र और विवादास्पद बातें होती हैं, जिसमें भाव की प्रधानता नहीं, निभाने के गुण नहीं। अगर कोई सकारात्मक पहलू होते भी हैं तो उसे ग्रहण नहीं करते, पर नकारात्मक बातों का जल्दी अनुकरण करते हैं और कहते हैं, “जमाना बदल गया है”। कितनी दुखद स्थिति है, हम सोच सकते हैं।

 

आज विवाह पूर्व प्री-वेडिंग फोटोशूट का चलन बढ़ा है, जिसमें युवक-युवती विवाह के कुछ दिन पूर्व अपने नए रिश्ते में मिठास घोलने और उन्हें यादगार बनाने के लिए कहीं बाहर जाकर एकांत में फोटो के साथ वीडियो शूट करवाते हैं। कुछ जोड़े तो एक मर्यादित लिबास में होते हैं, जिसमें कोई आपत्ति नहीं। लेकिन उस समय सोचने पर मजबूर हो जाते हैं जब विवाह के पूर्व यह अजीबो-गरीब शौक देखकर शर्म से सिर झुक जाता है। लड़की एकदम छोटे लिबास में लड़के के साथ बेहद अश्लीलता का परिचय देते हुए विभिन्न पोज में फोटो खिंचवाती है और वीडियो भी बनते हैं। बिना संकोच के सोशल मीडिया पर अपने मित्रों और रिश्तेदारों में शेयर करते हैं। हालाँकि ये आपकी जिंदगी है, किसी को दखल देने का अधिकार नहीं। लेकिन सोचिए! यही हम आगे हस्तांतरित कर रहे हैं आने वाली पीढ़ी को। क्योंकि जिसका चलन बढ़ जाता है उसे सभी दोहराते चलते हैं और यही परंपरा बन जाती है। और यह लड़कियों के लिए कई दृष्टि से हानिकारक है। सब ठीक रहा तो कोई बात नहीं, लेकिन अचानक किसी कारण से रिश्ते टूट जाएँ तो भविष्य के लिए यह मुसीबत का विषय बन जाता है।

 

समाज को सुधारने और कुरीतियों को दूर करने के लिए एक तरफ प्रबुद्ध जन लगे हुए हैं। दहेज प्रथा, बाल-विवाह, बेटी सुरक्षा, कन्या भ्रूण हत्या, बेटी शिक्षा और उनसे समान व्यवहार जैसे मुद्दों पर काम हो रहा है। वहीं एक नई बुराई को फैशन के नाम पर स्थापित करना सही नहीं। इस कुप्रथा को आगे बढ़ने से रोकने और खत्म करने में बेटियों को ही आगे आना होगा। अगर आप अपने माता-पिता की परवरिश को सम्मान देना चाहती हैं और भविष्य में किसी प्रकार का जोखिम मोल नहीं लेना चाहतीं, तो इस फूहड़ प्री-वेडिंग फोटोशूट की बीमारी को फैलने से पहले उपचार करना पड़ेगा। इसका विरोध बड़े-बुजुर्ग ही क्यों, हर बेटी को करना चाहिए जो अपने परिवार के बारे में सोचती है, उन्हें मानती है।

 

सादगीपूर्ण विवाह में भी अगर प्रेम की महक अधिक हो तो सुंदरता झलकती है। सिर्फ नाम कमाने और तारीफ बटोरने के लिए नहीं, जीवन को व्यवस्थित करने के लिए भी जरूरी है कि बेवजह के खर्च न करें। कर्ज के बोझ में जीवन भर दबे रहने से बेहतर है, जितनी क्षमता है उतना ही करें।

 

अंग-प्रदर्शन को फैशन कहने वालों को सोचना है। आज दुनिया भर के अपराध इस मोबाइल में हो रहे हैं। मानसिक रूप से कई प्रकार के तनाव से पहले से ग्रसित हैं, ऊपर से कुछ नयापन लाने और खुद को बेहतर दिखाने के लिए किसी भी गलत बात को स्वीकार करना उचित नहीं। प्री-वेडिंग फोटोशूट परिवार, समाज और किसी भी सभ्य राष्ट्र के निर्माण में सहयोगी नहीं है।

 

हर पीढ़ी अपने समय के अनुसार कुछ नया अपनाती है, यह स्वाभाविक है। परंतु नया अपनाते समय यह विवेक जरूरी है कि हम अपनी जड़ों से न कट जाएँ। विवाह केवल दो लोगों का नहीं, दो परिवारों, दो संस्कृतियों का मिलन है। इसकी पवित्रता बनाए रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है। दिखावे की चकाचौंध में रिश्तों की गहराई न खो जाए, इसका ध्यान रखना होगा। यादगार लम्हों को कैद करना गलत नहीं, लेकिन मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लाँघकर नहीं। तभी हम एक सशक्त, संस्कारी और संतुलित समाज का निर्माण कर पाएँगे।

 

आधुनिक बनना गलत नहीं, पर अपनी जड़ों को काटकर नहीं। परंपरा वह जड़ है जिससे आधुनिकता की शाखाएँ हरी रहती हैं। नयापन तभी तक सुंदर है जब तक वह मर्यादा की चौखट के भीतर हो।

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