पक्षियों के लिए पानी: एक बूंद जिंदगी की, एक सकोरा उम्मीद का।

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अंजनी सक्सेना

 

             (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

 

पक्षियों के लिए पानी: एक बूंद जिंदगी की, एक सकोरा उम्मीद का।

 

गर्मी का मौसम आते ही धरती तपने लगती है। इंसान पंखे, कूलर, एसी और ठंडे पानी का इंतजाम कर लेता है, पर क्या कभी सोचा है कि आसमान में उड़ने वाले उन बेजुबान परिंदों का क्या होता होगा,जिनके पास न घर है, न फ्रिज, न नल। उनके लिए तालाब सूख जाते हैं, नदियां दूर हो जाती हैं, और पेड़ भी अब शहरों में गिनती के बचे हैं। ऐसे में एक मिट्टी का बर्तन, उसमें भरा ठंडा पानी, उनके लिए किसी अमृत से कम नहीं होता। पक्षियों के लिए पानी रखना केवल दया का काम नहीं, प्रकृति के संतुलन और हमारी प्राचीन संस्कृति का भी हिस्सा है, जहां हर एक जीव को समान महत्व दिया गया है।।

इंसान तीन दिन बिना खाने के रह सकता है, पर बिना पानी के नहीं। पक्षियों का शरीर भी 60-70% पानी से बना होता है। गर्मियों में तापमान 45 डिग्री पार कर जाता है, तब उनके शरीर से पानी तेजी से वाष्प बनकर उड़ता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि एक छोटी चिड़िया का मेटाबॉलिज्म इंसान से 10 गुना तेज होता है। यानी उन्हें हर 15-20 मिनट में पानी की जरूरत पड़ती है। अगर 2-3 घंटे पानी न मिले, तो डिहाइड्रेशन से उनकी मौत हो सकती है। कबूतर, मैना, गौरैया, कौआ,सबको उड़ान भरने, पंखों को साफ रखने, खाना पचाने और अंडे देने के लिए पानी की आवश्यकता होती है।

एक समय हर घर के आंगन में फुदकने वाली गौरैया आज लुप्त होने की कगार पर है। इसकी एक बड़ी वजह पानी और दाने की कमी है। शहरों में अब जो गौरैया बची हैं, वो अक्सर आपकी छत पर रखे पानी के बर्तन पर ही निर्भर हैं।

पहले गांव-शहर सब जगह जोहड़, तालाब, कुएं होते थे। पक्षी वहीं से प्यास बुझाते थे। अब कंक्रीट के जंगल में न तालाब बचे, न पोखर। बिल्डिंगें इतनी ऊंची हो गई हैं कि बारिश का पानी भी जमीन तक नहीं पहुंचता।

अपने आसपास ही देखें तो पिछले 20 साल में शहरी इलाकों में अधिकांश जल स्रोत खत्म हो गए। कुएं,बावड़ी तो अब सूख ही गए हैं। मेरे घर के आसपास चार कुएं थे , जिनसे आसपास के लोग पानी भरा करते थे।गाय, कुत्ते और छोटे छोटे पंछी यहां पानी पीने आते थे। लेकिन अब हर घर में नल और बोरिंग के चलते सारे कुओं के पाट सूखे पड़े हैं।नतीजा गर्मियों में सैकड़ों पक्षी डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक से मर जाते हैं। मई-जून में पेड़ों के नीचे मरे हुए कबूतर, तोते, मैना मिलना आम बात हो गई है। कौआ और चील जैसे पक्षी तो फिर भी कचरे के ढेर से नमी पा लेते हैं, पर तोता, बुलबुल, गौरेया जैसी नाजुक चिड़ियाएं भी हैं जिन्हें दो बूंद पानी की बहुत मुश्किल से मिल पाती हैं।

पक्षियों को पानी पिलाना केवल पुण्य कमाना ही नहीं है, अपना ही भविष्य भी सुरक्षित करना है। ये पक्षी पर हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पक्षी फूलों का पराग एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं। बीज खाकर उसे दूर-दूर तक गिराते हैं। इसी से नए पेड़ उगते हैं। अगर पक्षी प्यास से मरेंगे, तो जंगल नहीं बनेंगे, और जंगल नहीं होंगे तो बारिश नहीं होगी।

एक अकेली गौरैया दिन भर में सैकड़ों कीड़े खाती है। अगर गौरैया न हो, तो फसलों को कीड़े चट कर जाएंगे। तब किसान ज्यादा कीटनाशक डालेगा, जो फिर हमारे खाने में आएगा।

गिद्ध, चील, कौआ मरे हुए जानवरों को खाकर बीमारी फैलने से रोकते हैं। ये सब जिंदा रहें, इसके लिए पानी पहली शर्त है। कुल मिलाकर पक्षियों को बचाना मतलब खेती, हवा, पानी और अपना स्वास्थ्य बचाना है।

हमारे देश में तो ‘जीव दया’ संस्कारों में ही रची बसी है। जैन धर्म में ‘पक्षी चबूतरे’ बनाने की परंपरा है।

हिंदू धर्म में सुबह-सुबह चिड़ियों को दाना-पानी देना शुभ माना जाता है। इस्लाम में भी बेजुबानों को पानी पिलाना सवाब का काम है।

हमारे दादा-दादी,नाना-नानी,गर्मी शुरू होते ही छत पर मिट्टी के सकोरे रख देते थे। यह मात्र एक परंपरा या अंधविश्वास नहीं, हजारों साल का अनुभव था। आज हम वातानुकूलित घरों और कार्यालयों में बैठकर वो अनुभव भूल गए।। ऐसी स्थिति में जरूरी है कि हर व्यक्ति अपने घर, दफ्तर या जहां पशु पक्षियों के लिए पानी रखना आसान हो वहां पानी रखे। इनके लिए पानी रखना सरल है पर सही तरीके से रखेंगे तो ज्यादा पक्षियों की जान बचेगी।

इसके लिए मिट्टी का चौड़े मुंह वाला बर्तन सबसे अच्छा है। मिट्टी पानी को ठंडा रखती है। प्लास्टिक गर्म हो जाता है और उसमें काई जल्दी लगती है। बर्तन 2-3 इंच गहरा हो ताकि छोटी चिड़िया डूबे नहीं।

इस बर्तन को छत, बालकनी, मुंडेर या पेड़ की डाल पर या ऐसी जगह जहां बिल्ली-कुत्ते न पहुंचें और धूप सीधी न आए वहां रख सकते हैं। छांव में पानी देर तक ठंडा रहता है। दो बर्तन रखें एक छांव में, एक धूप में क्योंकि कुछ पक्षी धूप में नहाना पसंद करते हैं।

याद से रोज थोड़ा समय निकालकर इस बर्तन का पानी बदलें। वरना मच्छर पनपेंगे और पक्षियों को बीमारी हो जाएगी। हफ्ते में एक बार बर्तन को खुरदुरे ब्रश से रगड़कर धोएं ताकि काई न जमे।

पानी के इस बर्तन के पास थोड़ा बाजरा, चावल के टुकड़े, ज्वार रख दें। गर्मी में पक्षियों को उड़ने की ऊर्जा चाहिए। पर ध्यान रहे नमकीन, तला-भुना या बासी खाना न डालें। वो उनके लिए जहर है।

यदि आप किसी बड़े शहर में या किसी बड़ी सोसायटी में रहते हैं तो अपनी सोसाइटी में हर बिल्डिंग पर कम से कम दस बर्तन रखने का नियम बनाएं। ऑफिस की छत पर पानी रखने की जिम्मेदारी भी सामूहिक रुप से ली जा सकती है। शिक्षक अपने स्कूलों में बच्चों को प्रोजेक्ट दे सकते हैं।

इतना सब पढ़कर आप सोच रहे होंगे कि मेरे एक बर्तन से क्या होगा? तो उसका उत्तर है कि एक मिट्टी का बर्तन दिन में 20-30 पक्षियों की प्यास बुझाता है। 3 महीने की गर्मी में एक बर्तन 2000 से ज्यादा बार किसी की जान बचाता है।

आपका बच्चा जब बच्चा रोज छत पर पानी भरता है, तो उसके अंदर करुणा का बीज पड़ता है। वो सीखता है कि दुनिया सिर्फ इंसानों की नहीं है। वो जिम्मेदारी सीखता है कि उसके भरोसे कुछ जिंदगियां हैं। याद रखिए आज जो बच्चा चिड़िया का ख्याल रखेगा, कल वो बुजुर्गों, गरीबों, पर्यावरण का ख्याल रखेगा। एक बर्तन पानी, एक पूरी पीढ़ी के संस्कार बदल सकता है इसलिए बच्चों को इस पहल से जोड़ना बहुत आवश्यक है।

केवल घरों के भरोसे नहीं रहा जा सकता। नगर निगम हर पार्क में, बस स्टैंड पर, सरकारी भवनों की छत पर ‘पक्षी जल केंद्र’ बनाए। कॉर्पोरेट कल्चर में इसे शामिल करें। एक मिट्टी का बर्तन, हजारों की जान बचाएगा। इससे सस्ता परोपकार क्या होगा?

पक्षियों को पानी पिलाने के लिए न पैसा चाहिए, न समय। चाहिए बस थोड़ी सी नीयत। तो आज जब तपती दोपहर में आप एसी या कूलर की ठंडी हवा लें, तो एक मिनट बाहर निकलकर सोचिए कि इस 45 डिग्री की भीषण गर्मी में कोई पंख फड़फड़ा रहा है, उसकी चोंच सूख रही है, आंखें पानी तलाश रही हैं।

कुदरत ने हमें सक्षम बनाया है। पक्षियों के पास पंख हैं, पर पानी का इंतजाम नहीं। हमारे पास साधन हैं, पर फुर्सत नहीं। तो इस गर्मी एक वादा खुद से करें कि मेरी छत पर कोई परिंदा प्यासा नहीं रहेगा। मिट्टी के एक बर्तन और रोज का साफ पानी यह मेरी दिनचर्या का हिस्सा रहेगा। आज एक बर्तन जरूर रखिए। कल पक्षियों की चहचहाहट लौट आएगी क्योंकि जिंदगी बूंद-बूंद से ही बनती है फिर चाहे वह इंसान की हो या परिंदे की।

(विभूति फीचर्स)

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